गुरुवार, 21 नवंबर 2024

भारतीय अर्थव्यवस्था के ऐतिहासिक विकास की समग्र यात्रा: कृषि, उद्योग, व्यापार और परिवहन

प्रस्तावना

भारतीय अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक विकास यात्रा विश्व की सबसे समृद्ध एवं जटिल सतत आर्थिक परंपराओं में गिनी जाती है। इसकी नींव प्राचीन सभ्यताओं में रखी गईजो नवपाषाण काल की कृषि क्रांति से शुरू होकर सिंधु घाटी जैसे शहरी केंद्रों के रूप में प्रकट हुई। समय के साथ– साथइसने विविध वातावरणप्रवासराज्य निर्माणविदेशी आक्रमणोंउपनिवेशी दखलस्वाधीनता आंदोलनहरित क्रांति एवं आज के डिजिटलीकरण तक अनेक आर्थिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। इस अध्ययन में कृषिउद्योगव्यापार एवं परिवहन के चारों स्तंभों का प्रत्येक युग में  विश्लेषण किया गया हैताकि प्राचीन भारत से लेकर वर्तमान भारत की आर्थिक यात्राचुनौतियाँउपलब्धियाँ तथा नवाचार समझे जा सकें। ODOP जैसी आधुनिक सरकारी नीतियोंहरित क्रांतिऔद्योगिकीकरणव्यापार उदारीकरण और परिवहन के तकनीकी विकास की समेकित चर्चा भी शामिल की गई है।

प्राचीन युग

कृषि विकास

प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। नवपाषाण काल (7000 ई.पू.- 3300 ई.पू.) में लोग शिकार एवं संग्रहण से हटकर स्थायी कृषि जीवन की ओर बढ़े। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों जैसी सभ्यताओं में गेहूंजौचनासरसोंकपास आदि की खेती के साक्ष्य मिलते हैं। हड़प्पा के लोगों ने सिंचित कृषिउन्नत जल प्रबंधन तथा संगठित भंडारण प्रणाली विकसित की। सिंधु घाटी के निवासियों ने नहरेंकुएंबांधतालाब तथा जल-निकासी जैसी तकनीकें अपनाईंजिनका सामुदायिक स्तर पर निर्माण और संचालन होता था। कपास की प्रारंभिक खेती हड़प्पा में ही की गईजिसने बाद में भारत के विश्वप्रसिद्ध वस्त्र उद्योग की नींव रखी।

वैदिक काल (1500-600 ईसा पूर्व) में जौगेहूंधानतिलदालों सहित पशुपालन का भी आर्थिक और सांस्कृतिक महत्त्व था। ऋग्वेद और अथर्ववेद जैसे ग्रंथों में कृषि संबंधित अनुष्ठानोंगाय के महत्त्व और वर्षा देवताओं की पूजा के विवरण मिलते हैं। महाजनपद काल- मौर्य और गुप्त काल तक खेती की तकनीकों में प्रगति हुई। मैदानी क्षेत्रों में नहरों और जलाशयों द्वारा सिंचाईभूमि सर्वेक्षणहल और बैलों के इस्तेमाल से उत्पादकता में वृद्धि हुई। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में कर प्रणालीसिंचाईभंडारणएवं कृषि नीति का संदर्भ मिलता हैजबकि अशोक ने नहर और जलाशय निर्माण पर विशेष ध्यान केंद्रित किया।

कृषि में सामाजिक पक्ष भी अहम था- भूमिकरसामाजिक-वर्गीकरणकृषक समुदाय की बढ़ती शक्ति और श्रमिकों/शिल्पकारों के लिए अवसर।

उद्योग विकास

प्राचीन काल के उद्योग मुख्यतः हस्तशिल्पकपड़ाधातुकर्म तथा शिल्प-कला पर केंद्रित थे। सिंधु घाटी के कारीगर मिट्टी के बर्तनधातु- मूर्तियाँमनकेआभूषणईंटें आदि बनाते थे। उद्योगों में धातुकर्म तकनीकलकड़ी की नक्काशीटेराकोटाबांस एवं बेंत के शिल्पहाथीदांतपत्थर की मूर्तियाँ इत्यादि शामिल थे।

मौर्य-गुप्त काल में धातुकर्म (जैसे दिल्ली का लौह स्तंभ)वस्त्र-निर्माण (कपासरेशम)रंग-निर्माणजड़ी-बूटियाँ एवं दवाइयाँखाद्य-प्रसंस्करण का भी विकास हुआ। गुप्तकाल में कारीगरों की एक बड़ी सेना थीजिसमें नाईबुनकरबढ़ईसुनारशिल्पकारआदि शामिल थे।

व्यापार विकास

प्राचीन भारत में व्यापार जटिल एवं विस्तृत था। हड़प्पा सभ्यता ने सीमा-पार व्यापार के लिए समुद्री रास्तों– अरब सागरओमानबहरीनमेसोपोटामिया से संपर्क (बंदरगाह: लोथलकच्छ) स्थापित किया। मुख्य व्यापार प्रणाली ‘वस्तु-विनिमय’ पर आधारित थीजिसमें आदान-प्रदान के लिए मुहरों/चिन्हों का इस्तेमाल होता था।

महाजनपदों के समय (600 ई.पू.धातु के सिक्कों और मुद्रा का चलन शुरू हुआजिससे व्यापारिक गतिविधियों और नगरीकरण को बल मिला। मौर्य सम्राटों ने अखिल भारतीय साम्राज्य में राजनीतिक एकीकरणसैन्य-सुरक्षासड़क एवं राजमार्ग निर्माणमुद्रा-नीति को सशक्त बनाकर व्यापार को बढ़ावा दिया।

बड़े नगर (हड़प्पामोहनजोदड़ोलोथल) और बाद में वाराणसीपाटलिपुत्रउज्जैनतक्षशिला आदि ट्रेडिंग केंद्र थे। सुमेरयूनानरोम के साथ व्यापार संपर्क स्थापित हुए। प्रमुख निर्यात- आयात वस्तुएं- मसालेकपड़ेपत्थरधातुएंआभूषणघोड़ेमदिराहाथी आदि थीं।

परिवहन व्यवस्था

प्राचीन भारत में परिवहन का विकास कृषि एवं व्यापार के साथ-साथ हुआ। सिंधु घाटी की नगरीय योजना में पक्की सड़केंजल-स्रोतजल निकासी-व्यवस्थाबंदरगाह जैसे लोथलमोहनजोदड़ो के प्रमाण हैं। यातायात के साधन थे- पैदलघोड़े/गधों द्वारा खींची गाड़ियाँबैलगाड़ीनावरथ तथा जंगली हाथी। नदियों पर नौकायनसमुद्री मार्गऔर जलमार्गों का व्यापार और यात्रा में उपयोग था।

मध्यकालीन युग

कृषि संरचना

मध्यकालीन भारत की कृषि मुख्यतः नियोजित राजस्व एवं भूमि प्रशासन पर आधारित रही। दिल्ली सल्तनत (13वीं-16वीं सदी) के दौरान इक्तादारी प्रणालीखालसा भूमिसिंचाई कर (हाब-ए-शर्ब), ‘उश्र’ (मुस्लिम भूमिकर), ‘खराज’ (गैर मुस्लिम भूमिकर) जैसी व्यवस्थाएँ प्रचलित थीं।

मलिक काफूर के अभियानों (द.भारत)फिरोज तुगलक द्वारा यमुनासतलुज आदि नहर निर्माणराजपूतों की बावड़ी-झीलें (पुष्करगडसिसर)चोलों का ग्रांड एनिकट जैसे बांध इनोवेशन के उदाहरण हैं। ज़मींदाररैयतबलुतेदारों एवं सामाजिक वर्गीकरण के साथ ही किसानों को भारी भूमिकरकर-बेहाली एवं ऋण के बोझ का सामना करना पड़ता था। दो फसलें (रबी और खरीफ)और कुछ जगह तीन फसलें भी उगाई जाती थीं।

अकबर के टोडरमल द्वारा ‘दहसाला’ (10-वर्षीय औसत उपज आधारित कर)भूमि पैमाइशफसली वर्गीकरणजागीर एवं मनसबदारी प्रणाली आदि से कृषि राजस्व-प्रशासन और ऋण वसूली की दक्षता बढ़ी। सामाजिक असमानता भी बढ़ीएवं किसान विद्रोह (जाटसिखमराठा) इस युग में आम रहे।

उद्योग और शिल्प

मध्यकालीन काल भारत के शिल्पवस्त्रधातुकर्मगलीचाकागज़नमकचीनीजहाज निर्माणचमड़ा तथा पत्थर की नक्काशी आदि हस्तशिल्प और उद्योगों के लिए अपनी विविधता हेतु प्रसिद्ध था। ढाका का मलमलगुजरात का पटोलाकश्मीर की शॉलबनारस सिल्करंगाई-छपाई (बंधेजकैलिको पेंटिंग) जैसे वस्त्र– शाही कार्यशालाओं (कारखानों) तथा दादनी प्रणाली (व्यापारी-कारीगर संबंध) के आधार पर प्रसिद्ध हुए।

शाही कारखानों में शाही परिवार के लिए उच्च गुणवत्ता के सामान बनते थेजबकि ग्रामीण कारीगर आम जरूरतें पूरी करते थे। धातुकलाचमड़ाजहाज निर्माणकागजबर्तनआभूषणनिर्माणफर्नीचरखिलौनेकंबलगलीचाआयुध आदि उद्योगों का देशअंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात होता था।

उद्योगों का सामाजिक और आर्थिक ढांचा विद्यमान था - जाति आधारित संगठन तथा दक्कन-महाराष्ट्र में बलुतेदार-कर्मी प्रमुख थे। पारंपरिक ज्ञान और गुरु-शिष्य परंपरा से तकनीकी और कौशल का हस्तांतरण हुआ।

व्यापार मार्ग

मध्ययुगीन भारत के पास विविध और उन्नत व्यापारिक संरचना थी। देश के भीतर मंडियाँहाट-बाजारमेलों में व्यापारबनजारे (अनाज व्यापारी)साहूकारहुंडी प्रणाली (क्रेडिट) सक्रिय थी। थोक व्यापार में साह-साहूबनजारेएवं बिचौलिए (सूदखोर) थेविदेशी व्यापार में अरबीफारसीतुर्कपुर्तगाली व्यापारी सक्रिय थे।

बड़े बंदरगाह (सूरतगोवाढाकामसुलीपट्टनमकोचीन) अंतरराष्ट्रीय व्यापार के केंद्र बनेजहाँ से मलसिल्ककाली मिर्चनीलकपड़ामसालेकठोर पत्थरशंखमोतीहीरे आदि निर्यात होते और घोड़ेशराबउम्दा ऊनगुलामगोला-बारूदरेशमसूखे मेवेआदि आयात होते थे। स्थल मार्ग – जैसी कि मुल्तानकंधारखैबर दर्रा एवं समुद्री मार्ग के जरिए फारसअरबअफ्रीकाचीनजापानइंडोनेशिया तक व्यापार होता था।

व्यापारी काफिलों में सफर करतेचलती फिरती दुकानोंहुंडी (ड्राफ्ट)मेले-ठेले (जानवरों का व्यापार)और चिट्ठियों/सूचना व्यवस्था (डाकघोड़सवारहरका) का प्रयोग भी था।

परिवहन साधन

इस युग में परिवहन का तीव्र विस्तार हुआ। स्थल मार्ग की बड़ी सड़कों के दोनों ओर पेड़सराय (विश्राम स्थल)पानी आदि की व्यवस्था होती थी। व्यापारिक दल बहुधा बनजारों और सैनिक सुरक्षा के साथ चलते थे। घाटियाँनदी मार्ग (गंगाझेलमयमुनासिंध) बहुपयोगी थीं। मुगलकालीन आगरा से बंगाल तक नावों का बेड़ा चलता थासूरत आदि में जहाज निर्माण और मरम्मत केंद्र थे।

डाक व्यवस्थासड़क परिवहन (बैलगाड़ीघोड़ाऊँट)जल परिवहन (नावजहाज)पहाड़ी/वन क्षेत्रों के लिए हाथी का इस्तेमाल होता था। शेरशाह सूरी की ग्रांट ट्रंक रोड और डाक चौकियांतथा मीर-ए-बहर (नौका अधिकारी) या ‘अमीरे बहर’ की नियुक्ति की जाती थी।

औपनिवेशिक युग (ब्रिटिश शासनकाल)

कृषि परिवर्तन

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय कृषि संरचना में ज़बरदस्त बदलाव हुआ। भूमि राजस्व प्रणाली को संरचित करने के लिए अंग्रेजों ने ‘जमींदारी’, ‘महालवाड़ी’ और ‘रैयतवाड़ी’ तीन व्यवस्थाएँ लागू की।

जमींदारी प्रणाली (1793, बंगाल): किसानों- भूमिहीन श्रमिकों पर अत्यधिक भारउच्च किरायाजमींदारों को भूमि का अधिनायकत्व। राजस्व असफलता पर किसानों की निरंतर बेदखली।
महालवाड़ी (उ.प्र.–पंजाब): गाँव आधारितकर की सामूहिक जवाबदेहीप्रशासनिक जटिलता और पंचायतों की शक्ति क्षीण।
रैयतवाड़ी (मद्रास-बंबई): स्वयं किसान भूमि का मालिकसीधे राज्य को करऋण के जाल और बेदखली की समस्या।

ब्रिटिश नीति ने किसानों को नकदी फसलें (कपासनीलजूटचाय) उगाने के लिए मजबूर कियाजिसने खाद्यान्न संकट- भूखमरी (बंगाल अकाल)कई स्थानों पर किसान विद्रोह को जन्म दिया।

नतीजा: ग्राम पंचायतों का विघटनभूमि का निजीकरणनए सामाजिक वर्ग (जमींदारव्यापारीसाहूकार)ग्रामीण ऋणकिसान आंदोलनों की लहर (नील विद्रोहपाबनासंथालदेक्कन आदि)।

औद्योगिकरण

ब्रिटिश काल भारतीय कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योग की बर्बादी और विदेशी (मूलतः ब्रिटिश) पूंजी आधारित उद्योगों के आगमन का युग था।
ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार एकाधिकारब्रिटिश वस्त्रों का आयातहथकरघाबुनाईलोहेचीनीकागजकांचचमड़े आदि उद्योगों का व्यापक ह्रास हुआ।
सस्ते ब्रिटिश कपड़ों ने भारतीय हस्तशिल्प को बेबस कर दियारेलवे ने विदेशी माल का गांव-गांव तक वितरण आसान बना दिया। कच्चे माल (कपासअफीमजूटमसाले) का विशाल निर्यात और तैयार माल का आयात हुआ।

आधुनिक उद्योग: 1850 के बाद सूती वस्त्रजूटकोयलाचायचीनीलोहा और इस्पातरेलवे कार्यशालाएँ आदि स्थापित। निवेशश्रमिकमशीनरी और प्रबंधन में बहुसंख्यक ब्रिटिश पूंजी का वर्चस्व थाभारतीयों की हिस्सेदारी सीमित रही।

व्यापार नीतियाँ

ब्रिटिश पूंजीवाद का मूल लक्ष्य भारत को कच्चे माल का स्रोत और तैयार माल का बाजार बनाना था। भारत का धन पलायन (ड्रेन थ्योरी)निर्यात-आयात असंतुलनभारतीय उद्योगों पर उच्च शुल्कयूरोपीय वस्तुओं की सस्ते दामों में आसान उपलब्धता और भारतीय व्यापार की दयनीयताइस युग की हकीकत थी।

रेलवेटेलीग्राफडाक (1876 यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन से जुड़ना)समुद्री जहाजरानी एवं बैंकों का विकास– व्यापारी हितों की पूर्ति और औपनिवेशिक प्रशासन की मजबूती के लिए हुआ न कि भारतीय जरूरतों के लिए। व्यापार घाटानिर्यात-आयात असंतुलनकर बोझ और ग्रामीण गरीबी कृषि/हस्तशिल्प बर्बादी का परिणाम बनी।

परिवहन अवसंरचना

रेलवे 1853 (मुम्बई-ठाणे 34km) से शुरू होकर पूरे उपमहाद्वीप में फैल गए परिणामस्वरूप 19वीं-20वीं सदी के आर्थिक राष्ट्र के ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। रेलवे के ज़रिए कच्चे मालसैनिकोंप्रशासन और तैयार माल के आवागमन की सुविधा हुई।

परिवहन के अन्य रूप– सड़कों का निर्माणट्राम (कलकत्ताबॉम्बे), जहाज-पोतडाक-व्यवस्थाबंदरगाहजल/वायु परिवहन का विकाससाइकिलमोटर-वाहन का आगमन– औपनिवेशिक शोषण प्रक्रिया का ही हिस्सा थाहालांकि भारतीय समाज ने इनका व्यापक प्रभाव भी देखा।

 

स्वतंत्रता के बाद का भारत

कृषि विकास एवं हरित क्रांति

स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय कृषि के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा की थी– बार-बार अकालखाद्यान्न की कमीझुलसे किसानछोटी जोतें। 1950 के दशक में भूमि सुधार (जमींदारी उन्मूलनभूमि सीमा कानून)सिंचाई विस्तार पचंयायती योजनाएँग्रामीण ऋण की व्यवस्थासहकारी आंदोलन प्रारंभ हुआ।

हरित क्रांति (1966 के बाद): HYV बीजरासायनिक उर्वरकमशीनेंसिंचाईMSP (लागत मूल्य गारंटी)कृषि का यंत्रीकरणकृषि विज्ञान केंद्रप्रयोगशालाएँक्षेत्रीय विस्तार (पंजाबहरियाणापश्चिमी यूपीबाद के चरणों में समूचा देश)– ने अनाज उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की।

परिणाम: भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भरअनाज उत्पादन (1951- 5 करोड़ टन से 2023- 30 करोड़ टन+)किसान आय में वृद्धिखाद्य आयात पर निर्भरता कम हुई। नकारात्मक पक्ष– क्षेत्रीय-अंतरभूमिहीनताकर्जमिट्टी-जल प्रदूषणकिसान आत्महत्यासामाजिक असमानता।

आधुनिक कृषि: कृषि में डिजिटल नवाचार– ई-नाम मार्केटड्रोन निगरानी, IoT सेंसरब्लॉकचेन सप्लाई चेनकृषि ऋण के डिजिटल प्लेटफॉर्मस्मार्ट इरिगेशन तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है।

औद्योगिकीकरण एवं नीतियाँ

1947–1991: औद्योगीकरण की नीति समाजवादी सार्वजनिक स्वामित्वभारी उद्योगबेरोजगारी उन्मूलन, ‘मिशन मोड’ (भूमिइस्पातकोयलाऊर्जारक्षा) के तहत थी। उद्योग नीति संकल्पकुटीर/लघु उद्योग समर्थनसार्वजनिक क्षेत्र का वर्चस्वलाइसेंस राजआयात प्रतिस्थापन्न सहित अन्य पहलें लागू हुई।

1991 के बाद: विदेशी मुद्रा संकटवैश्विक पूंजीऔर बाजार अर्थव्यवस्था की अवधारणा के साथ LPG (उदारीकरणनिजीकरणवैश्वीकरण) सुधार लाए गए।
लाइसेंस राज समाप्तसार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण (विनिवेश), FDI प्रोत्साहनतकनीक का आगमन, मेक इन इंडिया जैसे अनेक अभियान शुरू हुए।

प्रमुख नीतियाँ:

  • औद्योगिक नीति संकल्प 1948–1956 (सार्वजनिकनिजीसहकारी भागीदारी),
  • 1977 (लघु उद्योग प्रोत्साहन),
  • 1991 ( उदारीकरण, FDI, SEZ),
  • PLI योजना (2021),
  • कौशल विकासस्टार्टअप इंडिया, ODOP (एक जिला–एक उत्पाद) ने बदले भारत की औद्योगिक दिशा।

आधुनिक दौर: इंडस्ट्री 4.0, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसरोबोटिक्सस्मार्ट मैन्युफैक्चरिंगडिजिटल सर्विसेजमेक इन इंडियाइनोवेशन केंद्र, MSME क्षेत्र का सशक्तीकरण।

व्यापार उदारीकरण एवं ODOP

1991 के बाद व्यापार नीति में आया अभूतपूर्व परिवर्तननिर्यात को प्रोत्साहनआयात शुल्क में गिरावटलाइसेंस और प्रतिबंध हटाए गएरुपए के विनिमय दर में लचीलापन, WTO सदस्यता ।
प्राइवेट निर्यातकों को प्रोत्साहनकृषि प्रोसेसिंग और खेती से जुड़े उत्पादों के निर्यात में वृद्धि हुई। भारतीय निर्यात का दायरा 44.8 अरब डॉलर (1991) से बढ़कर $828 अरब (2020) तक पहुंचा।

ODOP (One District One Product): भारतीय राज्यों/जिलों की उत्कृष्ट कृषिहस्तशिल्प/प्रसंस्कृत वस्तुओं को वैश्विक ब्रांडिंग कन्वर्जेंसनिर्यात केंद्र बनने की राष्ट्रीय पहल।
– रोजगार सृजनग्रामीण उद्योग का सशक्तीकरणब्रांडिंगतकनीकी नवाचारइ-कॉमर्सवैश्विक नेटवर्किंग से ODOP समावेशी वृद्धि का नया आधार है।

परिवहन डिजिटलीकरण

आधुनिक भारत के लिए परिवहन की डिजिटल क्रांति विकास की नई धारा है। मेट्रोबुलेट ट्रेनइलेक्ट्रिक वाहनडिजिटल टिकटिंगचार्जिंग स्टेशनों का नेटवर्कइंटीग्रेटेड इन्फ्रास्ट्रक्चरराष्ट्रव्यापी हाईवे/एक्सप्रेसवे जाल– सब मिलकर भारत की अर्थव्यवस्था के ढांचे को नया आकार दे रहे हैं।

नीतियाँ व पहलें: भारतमाला परियोजनागति शक्ति योजनाराष्ट्रीय राजमार्ग–सड़क सुधार, DFCCIL (Dedicated Freight Corridors), डिजिटल लोक परिवहन कार्डवाहन पंजीकरण/लाइसेंस डिजिटलीकरण, Vahan–Sarathi प्लेटफॉर्मFASTagड्रोन कार्गो नेटवर्कई-बस योजनाई-वाहनों को पीएलआई प्रोत्साहन (2021) 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2025 तक 56.75 लाख इलेक्ट्रिक वाहन पंजीकृत हो चुके हैंसार्वजनिक परिवहन डिजिटलीकरण से सेवा गुणवत्ता सुधर रही हैइंटीग्रेशन- सिंगल टिकटिंग मोबाइल एपडैशबोर्ड-आधारित निगरानी आदि को बढ़ावा मिल रहा है।

निष्कर्ष:

भारतीय अर्थव्यवस्था की यात्रा सातत्यउत्थान-पतनसामर्थ्य और नवाचार की कहानी है। प्राचीन काल में कृषिहस्तशिल्प व व्यापार की आत्मनिर्भरता से लेकर मध्यकालीन कारीगर समाजऔपनिवेशिक दोहनस्वतंत्रता के बाद की योजनाबद्ध प्रगतिहरित क्रांतिऔद्योगिकीकरण और नवीनतम डिजिटल बदलाव से यह विकास न सिर्फ़ आर्थिकबल्कि सामाजिकसांस्कृतिक एवं तकनीकी विमर्श का भी द्योतक है।

ओडीओपीमेक इन इंडियाडिजिटल इंडियाहरित परिवहन अभियानसार्वजनिक-निजी साझेदारी आदि आज नए भारत की छवि गढ़ रहे हैं। परंतु क्षेत्रीयसामाजिक व पर्यावरणीय असमानताबेरोजगारीकर्जभूमिहीनताग्लोबल प्रतिस्पर्धा और आर्थिक समावेशन की चुनौतियाँ भी सतत बनी हुई हैं।

अंततःभारत की इतिहासबद्ध आर्थिक परंपरा सीख– ‘नवाचार के साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन’– भविष्य की दिशा निर्धारित करती है। सशक्त नीतियाँसमावेशी दृष्टितकनीकी-कौशल विकास और अंत्योदय को केंद्र में रखकर ही देश को आर्थिक वैश्विकता की शिखर पर पहुँचाया जा सकता है।

 

आगे की राह

भारतीय आर्थिक विकास की यात्रा का सार यही है कि देश ने हर युग में परिवर्तनों और चुनौतियों के बीच नवाचारविविधता और समावेश को अपना मार्गदर्शन बनाया। वैश्वीकरण और चौथी औद्योगिक क्रांति के वर्तमान वातावरण मेंभारत के लिए चारों आर्थिक स्तंभों में डिजिटल रूपांतरणसमावेशी वृद्धिकिसानों-कारीगरों की समृद्धिनिर्यात विस्तारस्वच्छ एवं हरित परिवहनतथा स्थानीय उत्पादों की वैश्विक ब्रांडिंग सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। यही यात्रा भारत को आर्थिक महाशक्ति और सामाजिक-पर्यावरणीय रूप से संतुलित आदर्श राष्ट्र बनाएगी।

 


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