गुरुवार, 6 मई 2021

खालीपन

  राम आसरे वैसे तो सामुदायिक भावना से नशा करने में रुचि रखते हैं,परंतु आज तालाब के किनारे नितांत एकांत में टोटल से अपने भीतर के रिक्त स्थान को धुएं से भर रहे थे। उच्छ्वास की क्रिया से भीतर का स्थान नैसर्गिक तरीके से पुनः रिक्त हो जा रहा था, जिसे राम आसरे बार-बार भरने की कोशिश कर रहा था।

   अपने भीतर के खालीपन को भरने की इस कोशिश को यहीं रोक कर राम आसरे उठा और आगे बढ़ चला।उसे समझ में आ गया कि सामूहिकता का कार्य अकेले से नही हो सकता और वही पदार्थ भीतर के खालीपन को भर सकता है जो भीतर जा के टिक सके अर्थात मदिरा।पंचायत चुनाव के पहले की बात होती तो कोई समस्या नहीं थी।प्रत्याशी लोग जबरन "पौवा" पकड़ा जाते थे,परंतु चुनाव के बाद तो जैसे आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो गई है।

    चुनाव के बाद ऐसी स्थिति की कल्पना राम आसरे न कर सका था।उसे लग रहा था कि "भैया जी" की कृपा सदैव बनी रहेगी।राम आसरे घर पहुंचा,पिताजी घर पर ही थे।किसी तरह नजर बचाकर घर में घुसा,गेहूं को झोले में भरकर पीछे के रास्ते से घर से निकल गया।देर रात घर लौटा तो पैर लड़खड़ा रहे थे।खालीपन दूर हो गया था,भारीपन को पैर संभाल नहीं पा रहे थे।

       

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

पंचायत चुनाव

 



समस्त ग्रामवासियों को मेरा हार्दिक प्रणाम,

       

      आशा करता हूं कि होली का पर्व आप सभी का हर्ष एवम् उल्लास से बीता होगा।एक और पर्व जिसे लोकतंत्र का महापर्व की संज्ञा दी जाती है,का शुभारंभ होने जा रहा है ,अर्थात चुनाव।आइए इस पर्व को भी भाई चारे के साथ मनाएं।जैसे हम होली में सारे गिले-शिकवे भुलाकर प्रेमपूर्वक एक दूसरे से मिलते हैं,ठीक उसी तरह लोकतंत्र के महापर्व में निज स्वार्थ को त्यागकर,सारे बैर -भाव भुलाकर ऐसे प्रत्याशियों का चुनाव करें जो गांव के विकास में सब को शामिल करते हुए एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण कर सकें।

       कुछ लोग येन -केन -प्रकारेण आप के निर्णय को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। लेकिन हमारा निर्णय लेना ही हमारे जिंदा होने की निशानी है। दूसरे के इशारे पर तो केवल मशीनें काम करती हैं।आपको इस चुनाव में यह साबित करना होगा कि आप जिंदा इंसान हैं,कोई वस्तु नहीं। आपका निर्णय आपका होगा किसी और का नहीं।निर्णय गलत होता है तो हमारे साथ साथ हमारी आने वाली पीढ़ी भी उसका परिणाम भोगती है।


        इतिहास के पन्नों में वो दौर भी देखे हैं,

           लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई।

  

     इन्ही शब्दों के साथ आप सभी को लोकतंत्र के महापर्व चुनाव की हार्दिक शुभकामनाएं।


                                         आप सभी का

                                       दीपक कुमार सिंह

                                          (असिस्टेंट प्रोफेसर)

                            हंडिया पी.जी. कॉलेज,प्रयागराज।


      

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

"जिस डाली में फल लगे हों वह झुक जाती है"

     "जिस डाली में फल लगे हों वह झुक जाती है"

     

     राम आसरे के पिताजी अधिक उम्र के कारण या विनम्रता के कारण या 'परधानी के चुनाव' के कारण झुक कर चल रहे थे,यह कह पाना मुश्किल था।राम आसरे एक बार नशे के धुन में पिताजी को धुन दिए थे,कुछ लोग इसे भी कारण बताया करते हैं।

    जिज्ञासावश राम आसरे के पिताजी से मैंने इसका कारण जानना चाहा।पिताजी ने व्यंग्यात्मक हंसी में इसका जवाब कुछ इस तरह दिया," बेटा मैं डबल एम.ए.हूं।मैंने नेट और पी.एच. डी. भी किया है।बेटा अब अपने मुंह मियां मिट्ठू क्या बनूं,बस इतना समझ लो कि इस गांव में परधानी के उम्मीदवार में कोई मेरे बराबर का पढ़ा लिखा नहीं है।तुम तो पढ़े लिखे हो,यह कहावत तो सुनी होगी,' जिस डाली में फल लगे हों वह झुक जाती है ',बस मेरे झुके होने का यही कारण हैं।

      पिताजी के इस उवाच से मैंने महसूस किया कि जैसे मैं भी थोड़ा सा (अपनी पढ़ाई के बराबर) झुक गया हूं।फिर मैंने दूसरा प्रश्न पूछा,पिताजी इतनी डीग्री लेने के बाद आपको नौकरी क्यूं नहीं मिली ? इस बार विष्णु मुद्रा में मुस्कुराते हुए पिताजी ने जवाब दिया," बेटा नौकरी के लिए तो लोग हमारे पीछे-पीछे घूम रहे थे,लेकिन मैंने गांव की सेवा का संकल्प लिया था।इसलिए नौकरी का त्याग कर दिया।" पिताजी के इस जवाब से मै पहले की अपेक्षा और झुक गया,परंतु इस बार शर्म से।मुझे लगा कि थोड़ी सी आय के लिए मैंने नौकरी कर ली और पिताजी ने गांव के लोगों उत्थान के लिए नौकरी का उत्सर्ग कर दिया।

      मैं शर्म से झुकने की जगह शर्म से गड़ने वाली स्थिति में हुआ जा रहा था कि राम आसरे ने दहाड़ मारी और अपने पिताजी को बेटा संबोधित करते हुए बोला,"बेटा,कौनऊ और डिग्री का जुगाड़ कर लो ताकि और झुक जाने के बाद उसका भी कारण बता सको,क्योंकि तुम्हें फिर से हौकनें का हमारा मन हो रहा है।" 

     इतना सुनने के बाद सहसा मेरा झुकाव गायब हो गया।मैंने स्वयं को सीधा,तना हुआ खड़ा पाया।समझ गया कि पिताजी में फल तो लगे हैं पर कड़वे फल।


जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय।


शनिवार, 9 जनवरी 2021

जे.के.मेहता के आर्थिक विचार

        जे.के.मेहता के आर्थिक विचार


    जे के मेहता भारतीय चिंतन परंपरा से गहरे रूप से प्रभावित थे। विशेष रुप से गांधी जी का उन पर बहुत अधिक प्रभाव था।इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन करने के पश्चात वहीं पर इन्होंने अध्यापन का कार्य भी प्रारंभ किया। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में किए गए विशेष योगदान को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इन्हें प्रोफेसर की उपाधि से नवाजा।

        जे के मेहता के प्रमुख आर्थिक विचार निम्न है-

अर्थशास्त्र की परिभाषा-जे के मेहता द्वारा दी गई अर्थशास्त्र की परिभाषा को 'आवश्यकता विहीनता' के नाम से जाना जाता है। आपके अनुसार,"अर्थशास्त्र का विज्ञान है जो माननीय आचरण का इच्छा रहित अवस्था में पहुंचने के एक साधन के रूप में अध्ययन करता है।"

   जे के मेहता संतुष्टि और सुख में अंतर करते हैं। उनके अनुसार संतुष्टि वस्तुओं के उपभोग से प्राप्त होती है,जबकि सुख आवश्यकताएं को कम करने से प्राप्त होती है। व्यक्ति की जितनी ही आवश्यकता कम होगी वह उतना ही वह सुखी होगा।अधिकतम सुख इच्छा रहित अवस्था में ही निहित है। व्यक्ति की प्रत्येक इच्छा चुनाव की समस्या उत्पन्न करता है,क्योंकि इच्छाएं अनंत हैं और साधन सीमित। इस प्रकार इस चुनाव की समस्या से व्यक्ति का मानसिक संतुलन असंतुलित होता है और वह सुख से वंचित हो जाता है।

प्रतिनिधि फर्म का विचार-

    प्रतिनिधि फार्म का सर्वप्रथम विचार मार्शल द्वारा दिया गया,परंतु जेके मेहता ने मार्शल द्वारा दी गई परिभाषा में संशोधन किया। मेहता के अनुसार," प्रतिनिधि फर्म हुआ फर्म है जो उद्योग के साथ साथ अनुरूपी विस्तार अथवा संकुचन करने की प्रवृत्ति दिखाती है।"प्रतिनिधि फार्म के मूल्य निर्धारण में पूर्ति मूल्य की प्रत्यक्ष भूमिका मार्शल स्वीकार करते थे,जबकि मेहता का मानना था कि पूर्ति मूल्य परोक्ष रूप से मूल्य निर्धारण में शामिल होता है। मार्शल का मानना था कि प्रतिनिधि फार्म ना तो घटती है ना बढ़ती है जबकि मेहता के अनुसार प्रतिनिधि फर्म उद्योग के साथ-साथ संकुचन एवं विस्तार करती है।

लाभ का सिद्धांत-

       मेहता का मानना है कि व्यापार अनिश्चितताओं का खेल है।व्यापार में बहुत से जोखिम होते हैं।लाभ इन्हीं जोखिमों को वहन करने का पुरस्कार है।लाभ कोई बचत नहीं है, यह मजदूरी के समान कार्य करने पर ही प्राप्त होता है और यह धनात्मक होता है।

उपभोक्ता की बचत-

      उपभोक्ता की बचत की अवधारणा सर्वप्रथम द्यूपिट ने दी,जिसे बाद में मार्शल ने व्याख्यायित किया। मेहता ने उपभोक्ता की बचत की अवधारणा में संशोधन किया उनके अनुसार मिलने वाली उपयोगिता और दिए गए मूल्य का अंतर नहीं अपितु प्राप्त उपयोगिता और किए गए त्याग का अंतर उपभोक्ता की बचत है।आप इसे उपभोक्ता का लगान भी कहते हैं। मेहता मार्शल से इस बात से सहमत दिखते हैं कि उपयोगिता मापनी य है।वे हिक्स और एलेन आदि अर्थशास्त्रियों आलोचना करते हैं जिनका यह मानना था कि उपयोगिता की माप नहीं की जा सकती।

       मेहता के अनुसार जब तापक्रम आदि अमूर्त चीजों की माप की जा सकती है तो उपयोगिता की क्यों नहीं। वस्तु को दिया जाने वाला मूल्य ही उपयोगिता की माप है।

साम्य का विचार -

      मेहता साम्य को दो भागों में विभाजित करते हैं - स्थिर साम्य प्रवैगिक साम्य। साम्य के लिए समय नामक तत्व आवश्यक है। स्थिर साम्य समय अवधि के बाहर भी बना रहता है जबकि प्रावैगिक साम्य समयावधि के बाहर भंग हो जाता है।

बाजार संबंधी विचार -

     मेहता के अनुसार,"बाजार वह दशा है जिसमें कोई वस्तु बिक्री हेतु उस स्थान पर लाई जाती है जहां उसकी मांग होती है।"

       इस प्रकार हम देखते हैं कि अर्थशास्त्र के विभिन्न पक्षों पर मेहता द्वारा अपने सारगर्भित विचार प्रकट किए गए। यद्यपि अर्थशास्त्र की आवश्यकता विहीनता नामक परिभाषा की इस आधार पर आलोचना की जाती है कि अर्थशास्त्र से यदि उपभोग निकाल दिया जाए तो पूरा अर्थशास्त्र ही धराशाई हो जाएगा। इच्छा विहीनीता की स्थिति में आर्थिक क्रियाएं समाप्त हो जाएंगी। समग्रता की दृष्टि से देखें तो यह आलोचनाएं निराधार हैं।मेहता की जो दृष्टि थी वह समग्रता की थी।अत्यंत भोग की अवस्था ने आज कई प्रकार की सामाजिक,आर्थिक एवं पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न की हैं,जिससे पूरा विश्व चिंतित दिखाई देता है ।कोरोना काल ने हमारे सारे विकास को बेमानी कर दिया है।मेहता के विचारों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है।

     


     

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

What will I do in improving the quality of education in my institution?

 What will I do in improving the quality off education  in my institution?

     

        शिक्षक समाज का मार्गदर्शक होता है। उस के सानिध्य में  युवा पीढ़ी के रूप में अनंत ऊर्जा का स्रोत होता है,जिसे वह जिस रूप में चाहे प्रसारित कर सकता है। इसलिए एक शिक्षक को सदैव सजग,चेतनवत एवं समसामयिक होना चाहिए। गुरु में वह क्षमता होती है जो एक अपराधी को बाल्मीकि जैसा प्रकांड विद्वान बना सकता है। शिक्षक आईना की भांति होता है जिसमें झांककर शिष्य अपना व्यक्तित्व गढ़ता है।शिक्षक रूपी उन्नत शिखर की छांव में छात्र पुष्पित और पल्लवित होता है और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नित नए आयाम स्थापित करता रहता है। शिक्षक सभ्यता, संस्कृति,मूल्य, मान्यता एवं ज्ञान का संवाहक होता है।यह गुरुता शिक्षक के समक्ष उत्तरदायित्व की अपेक्षा करता है कि वह अपना चरित्र उन्नत रखे।

         शिक्षक समाज का हिस्सा बनकर मैं स्वयं को धन्य पाता हूं तथा सदैव इस बोध के साथ जीता हूं कि एक शिक्षक के रूप में अपना कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का निर्वहन पूरी ईमानदारी और निष्ठा से कर सकूं। मैं हंडिया पी.जी. कॉलेज हंडिया, प्रयागराज के अर्थशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हूं। मेरा मानना है कि शिक्षक का आचरण छात्र के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। इसलिए स्वयं के आचरण के प्रति मैं सदैव सजग रहता हूं तथा छात्रों के बीच अपनी उपस्थिति सादा जीवन उच्च विचार के रूप में रखने की कोशिश करता हूं।'बड़ों का आचरण छोटों के लिए पाठशाला होती है', इसका मैं सदैव ध्यान रखता हूं।

        कोरोना संकट ने अध्ययन अध्यापन की पूरी प्रक्रिया को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। इस संकट ने जहां एक ओर शिक्षण कार्य को प्रभावित किया है तो वहीं दूसरी ओर इसने शिक्षण कार्य में नई विधियों को प्रयोग किए जाने के लिए अवसर भी प्रदान किया है। शिक्षण कार्य को असरदार बनाने के लिए मैं इंफॉर्मेशन और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी का प्रयोग करना चाहूंगा। अब वह समय नहीं रहा की कॉलेज की घंटी बजने के साथ ही पढ़ाई का कार्य बंद हो जाए। अब समय आ गया है जब हम आंख बंद करते हैं उसी के साथ ही पढ़ाई की प्रक्रिया भी बंद होती है।यह सब इनफार्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी के द्वारा ही संभव हुआ है। आज हम बिना इन तकनीकों के समुचित प्रयोग से समसामयिक अध्ययन अध्यापन का कार्य नहीं कर सकते। विभिन्न प्रकार के सोशल मीडिया के मंच यथा,व्हाट्सएप,फेसबुक,यूट्यूब आदि के माध्यम से ज्ञानवर्धक पाठ्य सामग्री छात्रों तक सुलभ है। आज के भौतिक दूरी के समय में यही मंच मानसिक दूरी को समाप्त करने में सक्षम हुए हैं। इसी के साथ सरकार द्वारा भी कई ऐसे मंच उपलब्ध कराए गए हैं जो भौतिक दूरी के मानदंडों को पूरा करते हुए छात्रों को ज्ञानवर्धक और उपयोगी सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। epg pathshala, mooc, swayam, Arpit,रेडियो पर प्रसारित ज्ञानवाणी आदि ऐसे ही कुछ प्लेटफार्म है जो आसान एवं सुलभ तरीके से छात्रों के बीच उपलब्ध हैं। इन सब मंचों का शिक्षण कार्य में प्रयोग कर छात्रों को समसामयिक एवं उन्नत ज्ञान प्रदान किया जा सकता है।इन तकनीकों का मैं अपने शिक्षण कार्य में प्रयोग करना चाहूंगा।

          Google forms, Google classroom, Google docs, Google meet, Zoom यह ऐसे ऐप हैं जिनके माध्यम से अध्ययन सामग्री बच्चों तक आसानी से पहुंचाई जा सकती है तथा उनका मूल्यांकन भी किया जा सकता है। मूल्यांकन की जो प्रक्रिया पहले बहुत जटिल हुआ करती थी तथा जिस में बहुत समय लगता था,अब वह इन ऐप के माध्यम से बेहद आसान हो गया है। मैं अपने अध्यापन कार्य में छात्रों के मूल्यांकन को विशेष स्थान देना चाहूंगा जिससे उनकी कमियों एवं उनमें निहित खूबियों का ससमय पता लगाया जा सके और उनको सही मार्गदर्शन दिया जा सके।

         आज हम ऐसे समय में प्रवेश कर गए हैं जहां जिस विषय पर संबंधित जानकारी हमको चाहिए वह एक क्लिक पर हमारे सामने उपलब्ध है। सूचना के जाल में हम एक तरह से घिरे हुए हैं। यद्यपि सूचनाओं का भरमार है,तथापि यह समस्या भी है कि हम कौन सी सूचना ग्रहण करें तथा उससे संबंधित सूचना का स्रोत क्या है?यहां पर शिक्षक के रूप में हम अपनी उपयोगिता को सिद्ध करेंगे तथा सूचना एवं सूचना के स्रोतों से संबंधित जानकारी छात्रों को उपलब्ध कराएंगे।

        शिक्षण संस्थाओं के अन्यान्य उद्देश्यों में से एक प्रमुख उद्देश्य छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र विकास करना है।इसके लिए जहां एक ओर अध्ययन अध्यापन एवं मूल्यांकन की एक विधिवत प्रक्रिया है वहीं दूसरी ओर अतिरिक्त पाठयक्रम गतिविधियों के माध्यम से उनके समग्र व्यक्तित्व विकास का कार्य किया जाता है। गायन, वादन,भाषण, खेलकूद आदि अतिरिक्त शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र विकास करने की कोशिश करूंगा। महाविद्यालय, विश्वविद्यालय एवं अंतर विश्वविद्यालय स्तर पर होने वाले ऐसे कार्यक्रमों में छात्रों को प्रतिभाग करने के लिए प्रोत्साहित करूंगा। इस प्रकार के कार्यक्रम जहां छात्रों में क्षमता का वर्धन करते हैं वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय एवं सांस्कृतिक,सामाजिक एकीकरण में भी मदद मिलती है।

          छात्रों में शोध क्षमता विकसित करने का प्रयास करूंगा,जिससे वह आगे चलकर सामाजार्थिक समस्याओं पर गहन रूप से चिंतन कर सकें तथा कुछ मौलिक विचार प्रकट कर देश,समाज को लाभान्वित कर सकें। सरकार द्वारा भी इस दिशा में शिक्षकों से विशेष रूप से अपेक्षा किया जा रहा है। आज का युग नवीन ज्ञान एवं नवाचार का युग है। आज वही देश अग्रणी है जो नवाचार के क्षेत्र में अग्रणी हैं। नवाचार के इसी महत्व को स्वीकार करते हुए मैं छात्रों को इस दिशा में प्रेरित करने का प्रयास करूंगा।

          एक शिक्षक के बहुआयामी कर्तव्य होते हैं।जिसमें अध्ययन अध्यापन के अलावा प्रशासनिक कार्य भी सम्मिलित होता है। मुझे सौपे गए सभी प्रकार के प्रशासनिक कार्य मैं पूरी दक्षता से करने का निरंतर प्रयास करूंगा। सरकार द्वारा या शिक्षा के क्षेत्र में शीर्ष संस्थानों द्वारा किए जा रहे विशेष प्रयासों से अपने महाविद्यालय को लाभान्वित कराने का प्रयास करूंगा,जिससे छात्रों का हित हो सके। महाविद्यालय के आंतरिक अनुशासन एवं शैक्षणिक वातावरण को बेहतर बनाने का निरंतर प्रयास करूंगा। छात्र शिक्षक संवाद अथवा अभिभावक गोष्ठी को संचालित कर शिक्षा केंद्रित वातावरण बनाने का प्रयास करूंगा।

       अंत में,एक बेहतर शैक्षिक वातावरण बनाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।इसके लिए मैं अपने सभी सहशिक्षकों, प्रबंधतंत्र एवं अन्य कॉलेज स्टाफ से मदद प्राप्त करने की कोशिश करूंगा।


                                                सधन्यवाद।

         


वैश्विक वेतन की चौंकाने वाली सच्चाई: GDP बढ़ रहा है, असमानता घट रही है, पर आपकी सैलरी क्यों नहीं बढ़ रही?

क्या आपने कभी सोचा है कि जब देश की अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है, तो आपकी सैलरी  उस गति से क्यों नहीं बढ़ती? यह एक आम भावना है, लेकिन अंतर्...