बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

वैश्विक वेतन की चौंकाने वाली सच्चाई: GDP बढ़ रहा है, असमानता घट रही है, पर आपकी सैलरी क्यों नहीं बढ़ रही?

क्या आपने कभी सोचा है कि जब देश की अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है, तो आपकी सैलरी  उस गति से क्यों नहीं बढ़ती? यह एक आम भावना है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की हालिया 'ग्लोबल वेज रिपोर्ट 2024-25' कुछ ऐसे तथ्य सामने लाती है जो हमारी आम धारणा को चुनौती देते हैं।

यह रिपोर्ट वैश्विक वेतन के रुझानों पर एक गहरी नज़र डालती है और कुछ आश्चर्यजनक और विरोधाभासी निष्कर्ष प्रस्तुत करती है। यह अध्ययन 82 देशों के प्रति घंटा वेतन के आंकड़ों पर आधारित है, जिसमें दुनिया के लगभग 76% वेतनभोगी कर्मचारी शामिल हैं, जो इसे एक व्यापक विश्लेषण बनाता है। एक तरफ जहाँ कुछ अच्छी खबरें हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ चिंताजनक चुनौतियाँ भी बनी हुई हैं।

यह लेख ILO रिपोर्ट के उन सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों को सरल और स्पष्ट बिंदुओं में आपके सामने रखेगा, ताकि आप समझ सकें कि दुनिया भर में वेतन का असल हाल क्या है।

वेतन असमानता असल में घट रही है—एक आश्चर्यजनक सच

यह एक ऐसी खबर है जिस पर यकीन करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन यह सच है। आम धारणा के विपरीत, ILO रिपोर्ट से पता चलता है कि 2000 के दशक की शुरुआत (विशेष रूप से 2006 के बाद) से वैश्विक स्तर पर वेतन असमानता में लगातार गिरावट आई है। वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में, जहाँ हम अक्सर बढ़ती असमानता की कहानियाँ सुनते हैं, यह एक दुर्लभ और आश्चर्यजनक अच्छी खबर है।

लेकिन यह अच्छी खबर उतनी सीधी नहीं है जितनी दिखती है। जब हम इन आँकड़ों की गहराई में जाते हैं, तो एक अलग ही कहानी सामने आती है।

इस "अच्छी खबर" के पीछे की असली कहानी: चीन

अब उस अच्छी खबर की गहराई में उतरते हैं। रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि वैश्विक वेतन के आंकड़ों पर चीन के असाधारण आर्थिक प्रदर्शन का बहुत गहरा प्रभाव है। असल में, वैश्विक औसत में जो सुधार दिख रहा है, उसके पीछे मुख्य रूप से चीन है।

कुछ प्रमुख तथ्य इस बात को और स्पष्ट करते हैं: ILO के सर्वेक्षण में शामिल कुल वेतनभोगी कर्मचारियों में से लगभग एक-तिहाई (32%) चीन से हैं। 2006 से 2024 की अवधि में, चीन में वास्तविक वेतन वृद्धि दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में दोगुनी से भी अधिक रफ़्तार से हुई। रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि अगर चीन के आंकड़ों को हटा दिया जाए, तो वैश्विक वेतन वृद्धि का रुझान बहुत कमजोर दिखाई देगा।

हम ज़्यादा उत्पादक हुए हैं, लेकिन हमारे वेतन में यह नहीं दिखता

यह रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष है। रिपोर्ट में "विकास-वेतन अंतर" (Growth–Wage Gap) की अवधारणा पर प्रकाश डाला गया है। इसका सीधा सा मतलब है कि वास्तविक वेतन वृद्धि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और उत्पादकता वृद्धि से लगातार पिछड़ रही है।

उच्च-आय वाले देशों के लिए यह आँकड़ा विशेष रूप से चौंकाने वाला है: 1999 और 2024 के बीच, इन देशों में श्रम उत्पादकता में 29% की वृद्धि हुई, जबकि वास्तविक वेतन में केवल 15% की वृद्धि हुई। यह अंतर दर्शाता है कि आर्थिक लाभ का वितरण पूंजी और श्रम के बीच समान रूप से नहीं हो रहा है, जिससे राष्ट्रीय आय में श्रमिकों की हिस्सेदारी कम हो रही है।

संक्षेप में, अर्थव्यवस्था तो बड़ी हो रही है, लेकिन उस विकास का एक छोटा और घटता हुआ हिस्सा ही श्रमिकों की जेब तक पहुंच रहा है।

सभी देशों की कहानियाँ एक जैसी नहीं हैं

रिपोर्ट यह भी बताती है कि चीन की वेतन वृद्धि ने अन्य प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है। जहाँ चीन ने असाधारण वृद्धि दर्ज की है, वहीं भारत और थाईलैंड जैसे देशों में वेतन वृद्धि मध्यम और असंगत रही है।

इन देशों में, केवल वियतनाम ही चीन के स्तर के करीब पहुँचता हुआ दिखता है, हालाँकि उसके आँकड़ों में अधिक अस्थिरता है। यह तुलना दर्शाती है कि केवल आर्थिक विकास ही पर्याप्त नहीं है; देशों के बीच यह अंतर औद्योगिक संरचना, श्रम नियमन और उत्पादकता लाभ जैसे कारकों में भिन्नता के कारण है, जो यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि विकास का लाभ श्रमिकों के वेतन तक पहुँचे।

एक जटिल तस्वीर और भविष्य के लिए एक सवाल

अंत में, ILO की रिपोर्ट एक जटिल तस्वीर पेश करती है। एक ओर, वैश्विक वेतन असमानता घट रही है, जिसका मुख्य श्रेय चीन को जाता है। दूसरी ओर, दुनिया भर के श्रमिकों के लिए उत्पादकता और वेतन के बीच एक परेशान करने वाली खाई मौजूद है, जिसका अर्थ है कि उन्हें आर्थिक विकास का उचित हिस्सा नहीं मिल रहा है।

यह निष्कर्ष समावेशी श्रम नीतियां, मजबूत सामाजिक सुरक्षा और सामूहिक सौदेबाजी जैसे तंत्रों की आवश्यकता पर जोर देता है। यह भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है: नीति निर्माता यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि आर्थिक विकास का लाभ अधिक निष्पक्ष रूप से साझा किया जाए और हर मेहनतकश तक पहुँचे?

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