प्रस्तावना
भारतीय अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक विकास यात्रा विश्व की सबसे समृद्ध एवं जटिल सतत आर्थिक परंपराओं में गिनी जाती है। इसकी नींव प्राचीन सभ्यताओं में रखी गई, जो नवपाषाण काल की कृषि क्रांति से शुरू होकर सिंधु घाटी जैसे शहरी केंद्रों के रूप में प्रकट हुई। समय के साथ– साथ, इसने विविध वातावरण, प्रवास, राज्य निर्माण, विदेशी आक्रमणों, उपनिवेशी दखल, स्वाधीनता आंदोलन, हरित क्रांति एवं आज के डिजिटलीकरण तक अनेक आर्थिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। इस अध्ययन में कृषि, उद्योग, व्यापार एवं परिवहन के चारों स्तंभों का प्रत्येक युग में विश्लेषण किया गया है, ताकि प्राचीन भारत से लेकर वर्तमान भारत की आर्थिक यात्रा, चुनौतियाँ, उपलब्धियाँ तथा नवाचार समझे जा सकें। ODOP जैसी आधुनिक सरकारी नीतियों, हरित क्रांति, औद्योगिकीकरण, व्यापार उदारीकरण और परिवहन के तकनीकी विकास की समेकित चर्चा भी शामिल की गई है।
प्राचीन युग
कृषि विकास
प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। नवपाषाण काल (7000 ई.पू.- 3300 ई.पू.) में लोग शिकार एवं संग्रहण से हटकर स्थायी कृषि जीवन की ओर बढ़े। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों जैसी सभ्यताओं में गेहूं, जौ, चना, सरसों, कपास आदि की खेती के साक्ष्य मिलते हैं। हड़प्पा के लोगों ने सिंचित कृषि, उन्नत जल प्रबंधन तथा संगठित भंडारण प्रणाली विकसित की। सिंधु घाटी के निवासियों ने नहरें, कुएं, बांध, तालाब तथा जल-निकासी जैसी तकनीकें अपनाईं, जिनका सामुदायिक स्तर पर निर्माण और संचालन होता था। कपास की प्रारंभिक खेती हड़प्पा में ही की गई, जिसने बाद में भारत के विश्वप्रसिद्ध वस्त्र उद्योग की नींव रखी।
वैदिक काल (1500-600 ईसा पूर्व) में जौ, गेहूं, धान, तिल, दालों सहित पशुपालन का भी आर्थिक और सांस्कृतिक महत्त्व था। ऋग्वेद और अथर्ववेद जैसे ग्रंथों में कृषि संबंधित अनुष्ठानों, गाय के महत्त्व और वर्षा देवताओं की पूजा के विवरण मिलते हैं। महाजनपद काल- मौर्य और गुप्त काल तक खेती की तकनीकों में प्रगति हुई। मैदानी क्षेत्रों में नहरों और जलाशयों द्वारा सिंचाई, भूमि सर्वेक्षण, हल और बैलों के इस्तेमाल से उत्पादकता में वृद्धि हुई। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में कर प्रणाली, सिंचाई, भंडारण, एवं कृषि नीति का संदर्भ मिलता है, जबकि अशोक ने नहर और जलाशय निर्माण पर विशेष ध्यान केंद्रित किया।
कृषि में सामाजिक पक्ष भी अहम था- भूमिकर, सामाजिक-वर्गीकरण, कृषक समुदाय की बढ़ती शक्ति और श्रमिकों/शिल्पकारों के लिए अवसर।
उद्योग विकास
प्राचीन काल के उद्योग मुख्यतः हस्तशिल्प, कपड़ा, धातुकर्म तथा शिल्प-कला पर केंद्रित थे। सिंधु घाटी के कारीगर मिट्टी के बर्तन, धातु- मूर्तियाँ, मनके, आभूषण, ईंटें आदि बनाते थे। उद्योगों में धातुकर्म तकनीक, लकड़ी की नक्काशी, टेराकोटा, बांस एवं बेंत के शिल्प, हाथीदांत, पत्थर की मूर्तियाँ इत्यादि शामिल थे।
मौर्य-गुप्त काल में धातुकर्म (जैसे दिल्ली का लौह स्तंभ), वस्त्र-निर्माण (कपास, रेशम), रंग-निर्माण, जड़ी-बूटियाँ एवं दवाइयाँ, खाद्य-प्रसंस्करण का भी विकास हुआ। गुप्तकाल में कारीगरों की एक बड़ी सेना थी, जिसमें नाई, बुनकर, बढ़ई, सुनार, शिल्पकार, आदि शामिल थे।
व्यापार विकास
प्राचीन भारत में व्यापार जटिल एवं विस्तृत था। हड़प्पा सभ्यता ने सीमा-पार व्यापार के लिए समुद्री रास्तों– अरब सागर, ओमान, बहरीन, मेसोपोटामिया से संपर्क (बंदरगाह: लोथल, कच्छ) स्थापित किया। मुख्य व्यापार प्रणाली ‘वस्तु-विनिमय’ पर आधारित थी, जिसमें आदान-प्रदान के लिए मुहरों/चिन्हों का इस्तेमाल होता था।
महाजनपदों के समय (600 ई.पू.) धातु के सिक्कों और मुद्रा का चलन शुरू हुआ, जिससे व्यापारिक गतिविधियों और नगरीकरण को बल मिला। मौर्य सम्राटों ने अखिल भारतीय साम्राज्य में राजनीतिक एकीकरण, सैन्य-सुरक्षा, सड़क एवं राजमार्ग निर्माण, मुद्रा-नीति को सशक्त बनाकर व्यापार को बढ़ावा दिया।
बड़े नगर (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल) और बाद में वाराणसी, पाटलिपुत्र, उज्जैन, तक्षशिला आदि ट्रेडिंग केंद्र थे। सुमेर, यूनान, रोम के साथ व्यापार संपर्क स्थापित हुए। प्रमुख निर्यात- आयात वस्तुएं- मसाले, कपड़े, पत्थर, धातुएं, आभूषण, घोड़े, मदिरा, हाथी आदि थीं।
परिवहन व्यवस्था
प्राचीन भारत में परिवहन का विकास कृषि एवं व्यापार के साथ-साथ हुआ। सिंधु घाटी की नगरीय योजना में पक्की सड़कें, जल-स्रोत, जल निकासी-व्यवस्था, बंदरगाह जैसे लोथल, मोहनजोदड़ो के प्रमाण हैं। यातायात के साधन थे- पैदल, घोड़े/गधों द्वारा खींची गाड़ियाँ, बैलगाड़ी, नाव, रथ तथा जंगली हाथी। नदियों पर नौकायन, समुद्री मार्ग, और जलमार्गों का व्यापार और यात्रा में उपयोग था।
मध्यकालीन युग
कृषि संरचना
मध्यकालीन भारत की कृषि मुख्यतः नियोजित राजस्व एवं भूमि प्रशासन पर आधारित रही। दिल्ली सल्तनत (13वीं-16वीं सदी) के दौरान इक्तादारी प्रणाली, खालसा भूमि, सिंचाई कर (हाब-ए-शर्ब), ‘उश्र’ (मुस्लिम भूमिकर), ‘खराज’ (गैर मुस्लिम भूमिकर) जैसी व्यवस्थाएँ प्रचलित थीं।
मलिक काफूर के अभियानों (द.भारत), फिरोज तुगलक द्वारा यमुना, सतलुज आदि नहर निर्माण, राजपूतों की बावड़ी-झीलें (पुष्कर, गडसिसर), चोलों का ग्रांड एनिकट जैसे बांध इनोवेशन के उदाहरण हैं। ज़मींदार, रैयत, बलुतेदारों एवं सामाजिक वर्गीकरण के साथ ही किसानों को भारी भूमिकर, कर-बेहाली एवं ऋण के बोझ का सामना करना पड़ता था। दो फसलें (रबी और खरीफ), और कुछ जगह तीन फसलें भी उगाई जाती थीं।
अकबर के टोडरमल द्वारा ‘दहसाला’ (10-वर्षीय औसत उपज आधारित कर), भूमि पैमाइश, फसली वर्गीकरण, जागीर एवं मनसबदारी प्रणाली आदि से कृषि राजस्व-प्रशासन और ऋण वसूली की दक्षता बढ़ी। सामाजिक असमानता भी बढ़ी, एवं किसान विद्रोह (जाट, सिख, मराठा) इस युग में आम रहे।
उद्योग और शिल्प
मध्यकालीन काल भारत के शिल्प, वस्त्र, धातुकर्म, गलीचा, कागज़, नमक, चीनी, जहाज निर्माण, चमड़ा तथा पत्थर की नक्काशी आदि हस्तशिल्प और उद्योगों के लिए अपनी विविधता हेतु प्रसिद्ध था। ढाका का मलमल, गुजरात का पटोला, कश्मीर की शॉल, बनारस सिल्क, रंगाई-छपाई (बंधेज, कैलिको पेंटिंग) जैसे वस्त्र– शाही कार्यशालाओं (कारखानों) तथा दादनी प्रणाली (व्यापारी-कारीगर संबंध) के आधार पर प्रसिद्ध हुए।
शाही कारखानों में शाही परिवार के लिए उच्च गुणवत्ता के सामान बनते थे, जबकि ग्रामीण कारीगर आम जरूरतें पूरी करते थे। धातुकला, चमड़ा, जहाज निर्माण, कागज, बर्तन, आभूषण, निर्माण, फर्नीचर, खिलौने, कंबल, गलीचा, आयुध आदि उद्योगों का देश, अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात होता था।
उद्योगों का सामाजिक और आर्थिक ढांचा विद्यमान था - जाति आधारित संगठन तथा दक्कन-महाराष्ट्र में बलुतेदार-कर्मी प्रमुख थे। पारंपरिक ज्ञान और गुरु-शिष्य परंपरा से तकनीकी और कौशल का हस्तांतरण हुआ।
व्यापार मार्ग
मध्ययुगीन भारत के पास विविध और उन्नत व्यापारिक संरचना थी। देश के भीतर मंडियाँ, हाट-बाजार, मेलों में व्यापार, बनजारे (अनाज व्यापारी), साहूकार, हुंडी प्रणाली (क्रेडिट) सक्रिय थी। थोक व्यापार में साह-साहू, बनजारे, एवं बिचौलिए (सूदखोर) थे; विदेशी व्यापार में अरबी, फारसी, तुर्क, पुर्तगाली व्यापारी सक्रिय थे।
बड़े बंदरगाह (सूरत, गोवा, ढाका, मसुलीपट्टनम, कोचीन) अंतरराष्ट्रीय व्यापार के केंद्र बने, जहाँ से मल, सिल्क, काली मिर्च, नील, कपड़ा, मसाले, कठोर पत्थर, शंख, मोती, हीरे आदि निर्यात होते और घोड़े, शराब, उम्दा ऊन, गुलाम, गोला-बारूद, रेशम, सूखे मेवे, आदि आयात होते थे। स्थल मार्ग – जैसी कि मुल्तान, कंधार, खैबर दर्रा एवं समुद्री मार्ग के जरिए फारस, अरब, अफ्रीका, चीन, जापान, इंडोनेशिया तक व्यापार होता था।
व्यापारी काफिलों में सफर करते, चलती फिरती दुकानों, हुंडी (ड्राफ्ट), मेले-ठेले (जानवरों का व्यापार), और चिट्ठियों/सूचना व्यवस्था (डाक, घोड़सवार, हरका) का प्रयोग भी था।
परिवहन साधन
इस युग में परिवहन का तीव्र विस्तार हुआ। स्थल मार्ग की बड़ी सड़कों के दोनों ओर पेड़, सराय (विश्राम स्थल), पानी आदि की व्यवस्था होती थी। व्यापारिक दल बहुधा बनजारों और सैनिक सुरक्षा के साथ चलते थे। घाटियाँ, नदी मार्ग (गंगा, झेलम, यमुना, सिंध) बहुपयोगी थीं। मुगलकालीन आगरा से बंगाल तक नावों का बेड़ा चलता था, सूरत आदि में जहाज निर्माण और मरम्मत केंद्र थे।
डाक व्यवस्था, सड़क परिवहन (बैलगाड़ी, घोड़ा, ऊँट), जल परिवहन (नाव, जहाज), पहाड़ी/वन क्षेत्रों के लिए हाथी का इस्तेमाल होता था। शेरशाह सूरी की ग्रांट ट्रंक रोड और डाक चौकियां, तथा मीर-ए-बहर (नौका अधिकारी) या ‘अमीरे बहर’ की नियुक्ति की जाती थी।
औपनिवेशिक युग (ब्रिटिश शासनकाल)
कृषि परिवर्तन
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय कृषि संरचना में ज़बरदस्त बदलाव हुआ। भूमि राजस्व प्रणाली को संरचित करने के लिए अंग्रेजों ने ‘जमींदारी’, ‘महालवाड़ी’ और ‘रैयतवाड़ी’ तीन व्यवस्थाएँ लागू की।
जमींदारी प्रणाली (1793, बंगाल): किसानों- भूमिहीन श्रमिकों पर अत्यधिक भार, उच्च किराया, जमींदारों को भूमि का अधिनायकत्व। राजस्व असफलता पर किसानों की निरंतर बेदखली।
महालवाड़ी (उ.प्र.–पंजाब): गाँव आधारित, कर की सामूहिक जवाबदेही; प्रशासनिक जटिलता और पंचायतों की शक्ति क्षीण।
रैयतवाड़ी (मद्रास-बंबई): स्वयं किसान भूमि का मालिक, सीधे राज्य को कर, ऋण के जाल और बेदखली की समस्या।
ब्रिटिश नीति ने किसानों को नकदी फसलें (कपास, नील, जूट, चाय) उगाने के लिए मजबूर किया, जिसने खाद्यान्न संकट- भूखमरी (बंगाल अकाल), कई स्थानों पर किसान विद्रोह को जन्म दिया।
नतीजा: ग्राम पंचायतों का विघटन, भूमि का निजीकरण, नए सामाजिक वर्ग (जमींदार, व्यापारी, साहूकार), ग्रामीण ऋण, किसान आंदोलनों की लहर (नील विद्रोह, पाबना, संथाल, देक्कन आदि)।
औद्योगिकरण
ब्रिटिश काल भारतीय कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योग की बर्बादी और विदेशी (मूलतः ब्रिटिश) पूंजी आधारित उद्योगों के आगमन का युग था।
ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार एकाधिकार, ब्रिटिश वस्त्रों का आयात, हथकरघा, बुनाई, लोहे, चीनी, कागज, कांच, चमड़े आदि उद्योगों का व्यापक ह्रास हुआ।
सस्ते ब्रिटिश कपड़ों ने भारतीय हस्तशिल्प को बेबस कर दिया, रेलवे ने विदेशी माल का गांव-गांव तक वितरण आसान बना दिया। कच्चे माल (कपास, अफीम, जूट, मसाले) का विशाल निर्यात और तैयार माल का आयात हुआ।
आधुनिक उद्योग: 1850 के बाद सूती वस्त्र, जूट, कोयला, चाय, चीनी, लोहा और इस्पात, रेलवे कार्यशालाएँ आदि स्थापित। निवेश, श्रमिक, मशीनरी और प्रबंधन में बहुसंख्यक ब्रिटिश पूंजी का वर्चस्व था, भारतीयों की हिस्सेदारी सीमित रही।
व्यापार नीतियाँ
ब्रिटिश पूंजीवाद का मूल लक्ष्य भारत को कच्चे माल का स्रोत और तैयार माल का बाजार बनाना था। भारत का धन पलायन (ड्रेन थ्योरी), निर्यात-आयात असंतुलन, भारतीय उद्योगों पर उच्च शुल्क, यूरोपीय वस्तुओं की सस्ते दामों में आसान उपलब्धता और भारतीय व्यापार की दयनीयता, इस युग की हकीकत थी।
रेलवे, टेलीग्राफ, डाक (1876 यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन से जुड़ना), समुद्री जहाजरानी एवं बैंकों का विकास– व्यापारी हितों की पूर्ति और औपनिवेशिक प्रशासन की मजबूती के लिए हुआ न कि भारतीय जरूरतों के लिए। व्यापार घाटा, निर्यात-आयात असंतुलन, कर बोझ और ग्रामीण गरीबी कृषि/हस्तशिल्प बर्बादी का परिणाम बनी।
परिवहन अवसंरचना
रेलवे 1853 (मुम्बई-ठाणे 34km) से शुरू होकर पूरे उपमहाद्वीप में फैल गए परिणामस्वरूप 19वीं-20वीं सदी के आर्थिक राष्ट्र के ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। रेलवे के ज़रिए कच्चे माल, सैनिकों, प्रशासन और तैयार माल के आवागमन की सुविधा हुई।
परिवहन के अन्य रूप– सड़कों का निर्माण, ट्राम (कलकत्ता, बॉम्बे), जहाज-पोत, डाक-व्यवस्था, बंदरगाह, जल/वायु परिवहन का विकास, साइकिल, मोटर-वाहन का आगमन– औपनिवेशिक शोषण प्रक्रिया का ही हिस्सा था, हालांकि भारतीय समाज ने इनका व्यापक प्रभाव भी देखा।
स्वतंत्रता के बाद का भारत
कृषि विकास एवं हरित क्रांति
स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय कृषि के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा की थी– बार-बार अकाल, खाद्यान्न की कमी, झुलसे किसान, छोटी जोतें। 1950 के दशक में भूमि सुधार (जमींदारी उन्मूलन, भूमि सीमा कानून), सिंचाई विस्तार पचंयायती योजनाएँ, ग्रामीण ऋण की व्यवस्था, सहकारी आंदोलन प्रारंभ हुआ।
हरित क्रांति (1966 के बाद): HYV बीज, रासायनिक उर्वरक, मशीनें, सिंचाई, MSP (लागत मूल्य गारंटी), कृषि का यंत्रीकरण, कृषि विज्ञान केंद्र, प्रयोगशालाएँ, क्षेत्रीय विस्तार (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी, बाद के चरणों में समूचा देश)– ने अनाज उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की।
परिणाम: भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर, अनाज उत्पादन (1951- 5 करोड़ टन से 2023- 30 करोड़ टन+), किसान आय में वृद्धि, खाद्य आयात पर निर्भरता कम हुई। नकारात्मक पक्ष– क्षेत्रीय-अंतर, भूमिहीनता, कर्ज, मिट्टी-जल प्रदूषण, किसान आत्महत्या, सामाजिक असमानता।
आधुनिक कृषि: कृषि में डिजिटल नवाचार– ई-नाम मार्केट, ड्रोन निगरानी, IoT सेंसर, ब्लॉकचेन सप्लाई चेन, कृषि ऋण के डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्मार्ट इरिगेशन तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है।
औद्योगिकीकरण एवं नीतियाँ
1947–1991: औद्योगीकरण की नीति समाजवादी सार्वजनिक स्वामित्व, भारी उद्योग, बेरोजगारी उन्मूलन, ‘मिशन मोड’ (भूमि, इस्पात, कोयला, ऊर्जा, रक्षा) के तहत थी। उद्योग नीति संकल्प, कुटीर/लघु उद्योग समर्थन, सार्वजनिक क्षेत्र का वर्चस्व, लाइसेंस राज, आयात प्रतिस्थापन्न सहित अन्य पहलें लागू हुई।
1991 के बाद: विदेशी मुद्रा संकट, वैश्विक पूंजी, और बाजार अर्थव्यवस्था की अवधारणा के साथ LPG (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) सुधार लाए गए।
लाइसेंस राज समाप्त, सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण (विनिवेश), FDI प्रोत्साहन, तकनीक का आगमन, मेक इन इंडिया जैसे अनेक अभियान शुरू हुए।
प्रमुख नीतियाँ:
- औद्योगिक नीति संकल्प 1948–1956 (सार्वजनिक, निजी, सहकारी भागीदारी),
- 1977 (लघु उद्योग प्रोत्साहन),
- 1991 ( उदारीकरण, FDI, SEZ),
- PLI योजना (2021),
- कौशल विकास, स्टार्टअप इंडिया, ODOP (एक जिला–एक उत्पाद) ने बदले भारत की औद्योगिक दिशा।
आधुनिक दौर: इंडस्ट्री 4.0, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल सर्विसेज, मेक इन इंडिया, इनोवेशन केंद्र, MSME क्षेत्र का सशक्तीकरण।
व्यापार उदारीकरण एवं ODOP
1991 के बाद व्यापार नीति में आया अभूतपूर्व परिवर्तन; निर्यात को प्रोत्साहन, आयात शुल्क में गिरावट, लाइसेंस और प्रतिबंध हटाए गए, रुपए के विनिमय दर में लचीलापन, WTO सदस्यता ।
प्राइवेट निर्यातकों को प्रोत्साहन, कृषि प्रोसेसिंग और खेती से जुड़े उत्पादों के निर्यात में वृद्धि हुई। भारतीय निर्यात का दायरा 44.8 अरब डॉलर (1991) से बढ़कर $828 अरब (2020) तक पहुंचा।
ODOP (One District One Product): भारतीय राज्यों/जिलों की उत्कृष्ट कृषि, हस्तशिल्प/प्रसंस्कृत वस्तुओं को वैश्विक ब्रांडिंग कन्वर्जेंस, निर्यात केंद्र बनने की राष्ट्रीय पहल।
– रोजगार सृजन, ग्रामीण उद्योग का सशक्तीकरण, ब्रांडिंग, तकनीकी नवाचार, इ-कॉमर्स, वैश्विक नेटवर्किंग से ODOP समावेशी वृद्धि का नया आधार है।
परिवहन डिजिटलीकरण
आधुनिक भारत के लिए परिवहन की डिजिटल क्रांति विकास की नई धारा है। मेट्रो, बुलेट ट्रेन, इलेक्ट्रिक वाहन, डिजिटल टिकटिंग, चार्जिंग स्टेशनों का नेटवर्क, इंटीग्रेटेड इन्फ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्रव्यापी हाईवे/एक्सप्रेसवे जाल– सब मिलकर भारत की अर्थव्यवस्था के ढांचे को नया आकार दे रहे हैं।
नीतियाँ व पहलें: भारतमाला परियोजना, गति शक्ति योजना, राष्ट्रीय राजमार्ग–सड़क सुधार, DFCCIL (Dedicated Freight Corridors), डिजिटल लोक परिवहन कार्ड, वाहन पंजीकरण/लाइसेंस डिजिटलीकरण, Vahan–Sarathi प्लेटफॉर्म, FASTag, ड्रोन कार्गो नेटवर्क, ई-बस योजना, ई-वाहनों को पीएलआई प्रोत्साहन (2021) ।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2025 तक 56.75 लाख इलेक्ट्रिक वाहन पंजीकृत हो चुके हैं, सार्वजनिक परिवहन डिजिटलीकरण से सेवा गुणवत्ता सुधर रही है, इंटीग्रेशन- सिंगल टिकटिंग मोबाइल एप, डैशबोर्ड-आधारित निगरानी आदि को बढ़ावा मिल रहा है।
निष्कर्ष:
भारतीय अर्थव्यवस्था की यात्रा सातत्य, उत्थान-पतन, सामर्थ्य और नवाचार की कहानी है। प्राचीन काल में कृषि, हस्तशिल्प व व्यापार की आत्मनिर्भरता से लेकर मध्यकालीन कारीगर समाज, औपनिवेशिक दोहन, स्वतंत्रता के बाद की योजनाबद्ध प्रगति, हरित क्रांति, औद्योगिकीकरण और नवीनतम डिजिटल बदलाव से यह विकास न सिर्फ़ आर्थिक, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं तकनीकी विमर्श का भी द्योतक है।
ओडीओपी, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, हरित परिवहन अभियान, सार्वजनिक-निजी साझेदारी आदि आज नए भारत की छवि गढ़ रहे हैं। परंतु क्षेत्रीय, सामाजिक व पर्यावरणीय असमानता, बेरोजगारी, कर्ज, भूमिहीनता, ग्लोबल प्रतिस्पर्धा और आर्थिक समावेशन की चुनौतियाँ भी सतत बनी हुई हैं।
अंततः, भारत की इतिहासबद्ध आर्थिक परंपरा सीख– ‘नवाचार के साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन’– भविष्य की दिशा निर्धारित करती है। सशक्त नीतियाँ, समावेशी दृष्टि, तकनीकी-कौशल विकास और अंत्योदय को केंद्र में रखकर ही देश को आर्थिक वैश्विकता की शिखर पर पहुँचाया जा सकता है।
आगे की राह
भारतीय आर्थिक विकास की यात्रा का सार यही है कि देश ने हर युग में परिवर्तनों और चुनौतियों के बीच नवाचार, विविधता और समावेश को अपना मार्गदर्शन बनाया। वैश्वीकरण और चौथी औद्योगिक क्रांति के वर्तमान वातावरण में, भारत के लिए चारों आर्थिक स्तंभों में डिजिटल रूपांतरण, समावेशी वृद्धि, किसानों-कारीगरों की समृद्धि, निर्यात विस्तार, स्वच्छ एवं हरित परिवहन, तथा स्थानीय उत्पादों की वैश्विक ब्रांडिंग सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। यही यात्रा भारत को आर्थिक महाशक्ति और सामाजिक-पर्यावरणीय रूप से संतुलित आदर्श राष्ट्र बनाएगी।