गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

तैयारी करता हूँ......



           मेरे जीवन में इस कथन का बहुत महत्व रहा है।बेरोजगारी में इस वाक्य ने किसी अन्य वाक्य,वस्तु या संबंध से ज्यादा सहारा दिया है और गर्व करने का अवसर प्रदान किया है।परंतु अधिक समय इस वाक्य का उपभोग करने के कारण तैयारी के अंतिम पड़ाव पर इस वाक्य का स्वाद कटु और तीक्ष्ण हो गया,इसके प्रयोग से अजीब किस्म की अकुलाहट होने लगी यही कारण है कि सुरुआत में एक प्रेयसी की भांति प्रेम होने के बावजूद अंतिम समय में इसके छूटने पर कोई अफसोस नहीं रहा।हालांकि कुछ जीवट व्यक्तित्व इसके छूटने से या तैयारी न कर पाने के कारण आज भी अफसोस करते हैं।पर मुझे तो मुक्त होने जैसी अनुभूति होती है।

         कभी "तैयारी करता हूँ" कथन हम सभी को गर्व से भर देता था जो टायर में हवा की भांति होता था जो दिखाई तो नही देता था पर अनुभूति होती थी।इस कथन के प्रयोग मात्र से शरीर ऐसे अकड़ जाता था कि किसी भी चिकित्सक को टिटनेस होने का भ्रम हो जाय।तैयारी करने वाले के साथ-साथ घर-परिवार,समाज भी तैयारी के चमत्कार से अप्रभावित नही रह पाता था तथा तैयारी के "रिसाव प्रभाव" का रसपान करता रहता था।कालांतर में इन्हें भी स्वाद कटु और तीक्ष्ण लगने लगता था,वजह तैयारी करने वाले पर थोप दी जाती थी।

           अब देखता हूँ तो बहुत परिवर्तन हो चुका है,हो भी क्यों नहीं।जब सब बदल रहा है तो "तैयारी करता हूँ "कैसे अपरिवर्तित रहे।पर बड़ी निराशा होती है जब यह देखता हूँ कि तैयारी शुरू करने वाले का आत्मविश्वास रसातल के सबसे निचले पायदान पर पहुंचकर और नीचे जाने को व्याकुल है।जो कभी गर्व के साथ कहा जाता था कि तैयारी करता हूँ,आज पूंछने पर इस तरह जवाब दिया जाता है जैसे किसी लड़की को देखने जाइये और नाम पूछिये तो मारे शर्म के गड़ जाय और पूरी शक्ति संचित करके कहे...........बाबली ।

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