सोमवार, 23 दिसंबर 2019

लेबर चौराहा

                             लेबर चौराहा
           
                रामआसरे भोजपुरिया हीरो की तरह तैयार होकर बुलेट पर सवार  'देवी दर्शन' हेतु शहर की ओर चल पड़ा।रामआसरे के पिताजी केवल धक-धक की आवाज ही सुन पाए थे जो 'डॉप्लर इफेक्ट' के कारण कम होती जा रही थी।"आज उनसे मिलना है हमें" नामक निर्गुण रामआसरे गुनगुनाते हुए तीव्र गति से लक्ष्य की ओर बढ़ा जा रहा था।आत्मा,आत्मा से मिलकर परमात्मा होने को बेचैन थी।
            सहसा भीड़ देखकर रामआसरे चौंका और बुलेट को किनारे लगा दिया।उसे लगा कि देवी दर्शन का उद्देश्य सबको पता चल गया है।रामआसरे की आंखों के सामने पिछली बार कूटे जाने का दृश्य उभर आया।देखते ही देखते बीसों लोग रामआसरे को घेरकर खड़े हो गए।रामआसरे अंदर तक हिल चुका था।तब तक भीड़ में से आवाज आई "भैया हम सब काम कर लेते हैं,ईंटा-गारा,खेती-बारी, झाड़ू-पोंछा सब।आपके यहाँ क्या काम है।"
          रामआसरे की जान में जान आईं, परंतु यह सब इतनी शीघ्रता में हुआ कि रामआसरे जान में जान आने का साक्षात नहीं कर पाए।इसप्रकार दुनिया के सामने  यह रहस्य आज भी बरकरार है कि जान ,जान में से किस प्रकार जाती है और पुनः कैसे वापस आती है।रामआसरे को यह समझ में आ गया कि वह लेबर चौराहे पर खड़ा है और जिससे वह घिरा है वह सब लेबर हैं।
             इंसान की यह हालत देखकर रामआसरे द्रवित हो गया।आदमी बिक रहा था।सब के चेहरे पर भावशून्यता थी।व्यवस्था के प्रति रामआसरे के मन में गहरा असंतोष उतपन्न हुआ,क्रांति का भाव जागृत हुआ।मन हुआ कि इसी बुलेट पर मार्क्सवाद,लेनिनवाद,माओवाद,नक्सलवाद सबको बैठाकर पूरी व्यवस्था को रौंदकर सम करके साम्यवाद की स्थापना कर डाले।पर इतिहास में बुलेट पर सवार होकर किसी प्रकार की क्रांति का उदाहरण न पाकर उसने स्वयं की भावनाओं पर नियंत्रण कर लिया।क्रांति का विचार स्थगित हो गया।
              बुलेट आगे बढ़ी।बुलेट की धक-धक रामआसरे अपने सीने में महसूस कर रहा था। लेबर चौराहे के दृश्य से रामआसरे के भीतर उपजी कभी न नष्ट होने वाली अशांति, देवी दर्शन की कल्पना से बौद्ध दर्शन के क्षणिकवाद में परिवर्तित हो गई।
           

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