बुधवार, 29 अप्रैल 2020

मूल



        
             घर के सामने हाईवे और हाईवे पर लोगों का झुंड। आप सोच रहे होंगे कि लॉकडॉउन के पहले की बात कर रहा हूं। जी नहीं यह लॉकडाउन की ही बात है। एक महीने से अधिक हो चुके लॉकडाउन से उपजी विवशता और भावुकता का मारा ये वास्कोडिगामा का दल है जो नई दुनिया की नहीं बल्कि अपने घर,अपने मूल की खोज में निकल पड़ा है।
              जब कभी ये घर से निकले थे तब भी विवशता ही थी।गरीबी की निरपेक्ष भारतीय परिभाषा के आधार पर न्यूनतम कैलोरी की आवश्यकताओं की आपूर्ति न हो पाने की विवशता।यही विवशता ही है जो इन्हें यह भरोसा नहीं दे पा रही है कि सरकार इनके खाने पीने की व्यवस्था कर देगी।दरअसल सरकारी दावों को अभी तक ये झूठ होते हुए ही देखे थे,सो वर्तमान में सरकार द्वारा दिए जा रहे आश्वासन पर इनका विश्वास नहीं बन पा रहा।न्यूज चैनलों पर हकीकत से ज्यादा कोरोना की बर्बादी और आभासी दुनिया के झूठ ने इन्हें एन केन प्रकारेण घर पहुंचने को विवश कर दिया है।
              ये पूरी भीड़ है,पूरा कारवां है, जिसमें बच्चे हैं महिलाएं हैं। कुछ घर पहुंच गए हैं, कुछ की मंजिल अभी भी दूर है, कुछ संसार की यात्रा से थक हार कर अनंत यात्रा पर निकल चुके हैं।शेष को लाने की सरकार की तैयारी चल रही है।आप सोच रहे होंगे कि तैयारी में इतनी देर क्यों?तो भैया ये तैयारी है और तैयारी में देर होती ही है।यह ज्ञान हमें सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान हुआ था।
         आजा उम्र बहुत है छोटी,
             अपने घर में भी है रोटी.......चिट्ठी आयी है।

रविवार, 12 अप्रैल 2020

कोरोना त्रासदी में आम जन की भूमिका

कोरोना त्रासदी में आम जन की भूमिका.....
     उक्त विषयक कुछ लिख रहा हूं,इससे स्पष्ट है कि जिंदा हूं,क्यूंकि लाशे लिखा नहीं करतीं।आगे भी लिखता रहूंगा या नहीं यह केवल मेरे प्रयास से संभव नहीं है अपितु इसका उत्तर सामूहिक प्रयास में निहित है।कोरोना जो आज एक वैश्विक महामारी का रूप धारण कर चुका है,इसे सामूहिक प्रयास से ही समाप्त किया जा सकता है।इसलिए इस मानव त्रासद में आम जन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
       कोरोना स्वयं में अनोखी त्रासदी है जिससे लड़ा तो सामूहिक जाएगा परंतु समूह से दूर रहकर।यही सबसे बड़ी चुनौती है।जब-जब मानवता पर संकट आया है हमारे रण बांकुरे और वीरांगनाएं मिलकर लड़े हैं और बड़ी से बड़ी चुनौती का मिलकर सामना किया है तथा विजय पाई है।परंतु,महामारी एक ऐसी चुनौती होती है जिससे थोड़े समय के लिए अलग होकर जिसे "सोशल डिस्टेंसिंग" कहा जा रहा है,लड़ा जाता है।आज की चुनौती सामूहिक है और इससे सामूहिक रूप से ही निपटा जा सकता है। आवश्यकता समूह से दूरी बनाने की नहीं बल्कि उचित और पर्याप्त दूरी बनाने की है।
          अरस्तू का महत्वपूर्ण कथन कि, "मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है"तथा वह समूह में रहना पसंद करता है। लेकिन इसी के साथ यह भी सही है कि मनुष्य एक समझदार प्राणी भी है। आज जरूरत है समझदारी से काम लेने की। मानवता का भविष्य इस समय इसी समझदारी पर टिका हुआ है कि हम लोग कुछ समय के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। इस संकट की घड़ी में हमें जो कुछ करना है उसके लिए कहीं से प्रशिक्षण प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। हमारे देश में यह हमारे जीवन प्रणाली का हिस्सा रहा है, जिसे हम भौतिकता के चक्कर में तथा पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण में भूलते जा रहे हैं। आज पूरी दुनिया नमस्ते जैसे अभिवादन को स्वीकार कर रही है। यह हमारे जीवन प्रणाली का हिस्सा है, अभिवादन में नमस्ते,राम-राम हम यही तो करते हैं। हाथ को साफ रखना तथा साफ-सफाई करना यह भारतीय संस्कृति के लिए कोई नई चीज तो नहीं है। भोजन को ईश्वर तुल्य समझा जाता रहा है तथा रसोई को भगवान। बस यही भारतीय संस्कृति की स्वस्थ परंपराओं का हमें आज और आगे भी अनुपालन करना है।
        भारतीय मनीषियों द्वारा हमें योग का ऐसा धरोहर दिया गया है जिसके माध्यम से हम अपना आत्मिक और शारीरिक विकास कर सकते हैं,स्वस्थ रह सकते हैं तथा एक स्वस्थ भारत का निर्माण कर सकते हैं। योग के माध्यम से हम अपनी भावनाओं पर भी नियंत्रण कर सकते हैं, जिसकी आज बहुत आवश्यकता है। प्रत्येक व्यक्ति कोरोना की भयावहता से डरा हुआ है। संकल्प को मजबूत करके इस डर को दूर किया जा सकता है और इस संकल्प को मजबूत करने में योग बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। मेडिटेशन,संगीत हमें एकांत में रहने के लिए सहायता प्रदान कर सकते हैं।
        संकट की इस घड़ी में भौतिक दूरी को भले ही समर्थन दिया जा रहा हो,परंतु मानसिक एकता बहुत ही आवश्यक है। मानसिक रूप से पूरे देश को एकजुट होना होगा। कुछ लोग हैं जो संकट की इस घड़ी में भी अपने निहित स्वार्थों के कारण सरकार और व्यवस्था के समक्ष कोरोना से इतर समस्याएं उत्पन्न कर रहे हैं जो कोरोना से लड़ने की ताकत को क्षीण कर रहा है। ऐसे लोग स्पष्ट हो लें की जब समस्त मानवता संकट में होगी तो उनके लिए कहां स्थान होगा। अतः सभी लोगों को मतभेद और मनभेद भुलाकर इस लड़ाई में एकजुट होकर सरकार का सहयोग करना चाहिए और सरकार के आदेश एवं निर्देशों का अनुपालन करना चाहिए।
        कोरोना से लड़ने के लिए संस्थाओं एवं वैश्विक संगठनों द्वारा जो भी उपाय सुझाए जा रहे हैं वह तभी सफलीभूत होंगे जब आमजन उनका अनुपालन करेंगे। आज बच्चे, बूढ़े और जवान सभी सैनिक हैं तथा हमारा दुश्मन कोरोना है। एक भी सैनिक कमजोर हुआ तो लड़ाई जीती नहीं जा सकती। घर,परिवार, समाज की रक्षा लोगों से मिलकर नहीं बल्कि दूर रहकर की जा सकती है। ऋषि मनीषियों के संदर्भ में यह एक जनश्रुति है कि मानवता के कल्याण के लिए वह गुफाओं में बैठकर साधना करते हैं। क्या हम घर में बैठ कर मानवता के कल्याण के लिए अपना योगदान नहीं कर सकते हैं?इस विषय में सब को सोचना चाहिए।
        आइए संकल्प लें जब तक स्थितियां अनुकूल नहीं हो जाती हम सब मिलकर सोशल डिस्टेंसिंग का अनुपालन करेंगे तथा जो भी एडवाइजरी जारी की जाएगी उसका पूरी सामर्थ्य से पालन करेंगे।
   
                            दीपक कुमार सिंह
                                   (असिस्टेंट प्रोफेसर,अर्थशास्त्र)
                            हंडिया पी जी कॉलेज,प्रयागराज।

पी एम केयर्स


                           
जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिर्जनाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः |
‘मैं धर्म को जानता हूँ, पर उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्म को भी जानता हूँ, पर उसमें मेरी निवृत्ति नहीं होती |
       यह प्रसंग महाभारत का है। कृष्ण के धर्म उपदेश के बाद दुर्योधन ने यह कथन कहा था। कृष्ण ने भी अर्जुन को उपदेश देते समय कहा था कि "प्रवृत्ति ही बरत रहा है।"कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कार्य करने को आबद्ध है।
         राम आसरे के पिताजी अपनी प्रवृत्ति के अनुसार आचरण करने को आबद्घ थे। प्रवृत्ति उनकी दान की नहीं भोग की थी। हालांकि कोरोना संकट के बाद उत्पन्न आर्थिक हालात से प्रभावित होकर आज पीएम केयर्स में दान करने की उनकी इच्छा हुई थी। परंतु प्रवृत्ति का दास होने के कारण मनुष्य उसके विपरीत कुछ भी करने में सक्षम नहीं होता। राम आसरे के पिताजी के दान की इच्छा गर्म तवे पर डाले गए जल की बूंदों के समान गायब हो गई। उनके मन में यह तर्क आया कि जब प्रधानमंत्री राहत को ष पहले से ही था तो एक अलग कोष बनाए जाने की क्या आवश्यकता थी। चाहते तो इस प्रश्न का समाधान वह व्यक्तिगत स्तर पर कर सकते थे लेकिन उनके मन में डर यह था कि कहीं इस प्रश्न का कोई वाजिब जवाब मिल गया तो वह अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कार्य नहीं कर पाएंगे। इसलिए इस प्रश्न के समाधान के लिए उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया।
             परंतु, इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि राम आसरे के पिताजी के मन में कल्याण की भावना नहीं थी। लॉकडाउन के बाद से वे मदिरापान नहीं कर पाए थे। मदिरापान ना कर पाने के कारण उनके शरीर की सारी कोशिकाएं उन्हें धिक्कार रही थी। कोशिकाओं के न्यूनतम आवश्यकताओं की आपूर्ति में असफल राम आसरे के पिताजी स्वयं को लज्जित महसूस कर रहे थे। सो आज उन्होंने ठान लिया कि चाहे जितनी कीमत देने पड़े लेकिन वह आज कोशिकाओं को उनका मौलिक अधिकार दिला कर रहेंगे। बड़ी मुश्किल से दोगुने दाम पर एक खंभे की व्यवस्था कर पाए। राम आसरे के पिताजी आज पहली बार मोदी के समानांतर खुद को महसूस कर रहे थे। जहां एक और मोदी देश के करोड़ों लोगों को की आवश्यकताओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध दिख रहे थे तो वहीं राम आसरे के पिताजी अपने करोड़ों कोशिकाओं को संतुष्ट करने के लिए समर्पित थे। वास्तव में संकल्प शक्ति और उसके क्रियान्वयन में वह मोदी जी से बीस ही थे।
          इस प्रकार अपने संचित धन का अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उपयोग हो रहा था,प्रवृत्ति ही बरत रहा था।

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

लॉक डाउन में भाई साहब ससुराल में

 सौभाग्य और दुर्भाग्य समय सापेक्ष है। कब आपका सौभाग्य,दुर्भाग्य में बदल जाए कहा नहीं जा सकता। हमारे एक जानने वाले पहली बार ससुराल गए,तारीख थी 20 मार्च 2020। पहली बार ससुराल गए थे तो सेवा सत्कार जामकर हो रहा था। बेचारे आजीवन सबसे तिरस्कार ही सहे थे, सत्कार पाकर भाव विह्वल थे। 21 को घर वापसी की योजना थी, परंतु माताजी के प्रेम ने उन्हें रोक लिया। रुकते भी क्यों ना पहली बार मातृप्रेम जो मिल रहा था। ऐसा नहीं है कि भाई साहब के मां नहीं थीं,परंतु अपनी मां से वह प्रेम नहीं प्राप्त कर पाए थे जो आज प्राप्त कर रहे थे।
       भाई साहब को ससुराल में बड़ा आनंद आ रहा था उनका मन हो रहा था कि यही रुक जाएं और कभी वापस तिरस्कार क्षेत्र में ना जाएं। पहली बार ईश्वर ने उनके मन की सुनी और मोदी के वचन में प्रकट होकर 22 तारीख दिन रविवार को 'जनता कर्फ्यू' की घोषणा कर दी। भाई साहब डरे हुए थे कि घर जाकर क्या जवाब दूंगा, परंतु जब साली साहिबा ने लजाते हुए नजरें झुका कर यह कहा कि,"जीजा जी रुक जाइए ना", तो भाई साहब को घर वालों को जवाब देने की ताकत और रुकने की वजह मिल गई। अब चाहे कुछ भी हो जाए भाई साहब वहां से सरकने वाले ना थे।
       सुबह का नाश्ता,दोपहर का भोजन,शाम का नाश्ता, रात्रि का भोजन,भाई साहब के क्या कहने थे। उस पर सालियों के साथ हंसी-ठिठोली तो जैसे स्वर्गीय आनंद दे रहा था, बस भाई साहब स्वर्गीय नहीं थे। वैसे भाई साहब बड़े शर्मीले स्वभाव के थे, पर सालियों को कनखियों से देखते हुए शर्माना बड़े-बड़े शर्मीले लोगों को शर्मिंदा कर देने जैसा था। इसी खुशनुमा माहौल के बीच मोदी जी ने घोषणा कर दी "21 दिन का लॉक डाउन"। दिन बड़े अच्छे से बीत रहे थे भाई साहब के।
          भाई साहब का सौभाग्य दुर्भाग्य में बदलने वाला था। हुआ यूं कि सास माता का स्वास्थ्य खराब हो गया। यद्यपि घर में और लोग थे जो बाहर जा कर दवा ला सकते थे, लेकिन भाई साहब यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लिए। लाख मना करने पर भी भाई साहब नहीं माने। जब बाहर निकल रहे थे तो कनखियों से उन्होंने साली साहिबा को देखा।साली साहिबा की नजरें बता रही थी कि भाई साहब ने जिस उद्देश्य से यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ली थी उसमें वह सफल हो गए थे। घर से 2 किलोमीटर दूर बाजार था जहां से दवा लानी थी। अभी 1 किलोमीटर ही आगे आए थे कि पुलिस की गाड़ी आ गई। पुलिस वालों ने ना आव देखा ना ताव भाई साहब को जमकर धर दिए। भाई साहब जब तक घर से बाहर निकलने का कारण बता पाते तब तक कई लाठियां पड़ चुकी थी।
           भाई साहब लाक तो कई दिन से थे, पर डाउन आज हुए थे। इस तरह लाक डाउन आज पूर्ण हुआ था। भावुकता में आंसू आ गए थे भाई साहब को। किसी तरह दवा लेकर घर पहुंचे भाई साहब। उनका किसी से बात करने का मन नहीं हो रहा था। नजरें कनखियों की ओर नहीं जा पा रही थीं, बस एकटक जमीन पर टिकी थीं।म्यूजिक सिस्टम पर गाना बज रहा था,"मैं ससुराल नहीं जाऊंगी......।"

रविवार, 5 अप्रैल 2020

आतिशबाजी

                          आतिशबाजी
           कोरोना चीन से चिंग चंग चुंग करता हुआ तथा देश दुनिया का भ्रमण करते हुए जब भारत में प्रवेश किया तो बड़ा उत्साहित था। यहां चीन जैसा जनसंख्या का बेस था जिस पर वह बर्बादी का इतिहास लिखने के लिए तैयार था और साथी थे तबलीगी जमात। कोरोना जहां जाता वहां की स्थानीय भाषा को अख्तियार कर लेता ताकि कार्यवाही में आसानी हो। तबलीगी जमात के सहयोग से कोरोना प्रतापगढ़ में प्रवेश कर गया। उसके प्रवेश की सूचना पर शासन ,प्रशासन और आम लोगों में दहशत फैल गई।
            आगे की कार्यवाही के लिए तबलीगी जमात के सदस्यों के साथ कोरोना की मीटिंग चल ही रही थी कि अचानक से सारी लाइटें आफ हो गईं, उसके बाद टिम-टिम करते दिए जल उठे।कोरोना के सरदार और उसकी टीम को समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है। "ई का वा हो"  टीम के सरदार ने पूंछा।"अरे ई मोदिया सबसे अपील केहे रहा कि आज सब दिया जलाईह" एक सदस्य ने जवाब दिया। अभी ऐसा वार्तालाप चल ही रहा था कि धड़ाम धड़ाम की आवाज आने लगी। आसमान में आतिशबाजी होने लगी। सारे कोरोना को जैसे गोली सा लगने लगा।
           करोना का सरदार सीना पकड़कर तड़पते हुए बोला,"करे सरवा ऊ त केवल दिया जलावे के लिए कहे रहा त ई आतिशबाज़ी कैसे होय लाग।"मुखिया ने जासूस और तबलीगी जमात की ओर शक की निगाहों से देखा। परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी सभी को रोना आतिशबाजी के साथ तड़प-तड़प कर मरने लगे। सरदार ने तबलीगी जमात की ओर देखते हुए अपने अंतिम शब्द बोले,"देख बे भो....के अब त जीतने कोरोना बाहर हैं ऊ सब साले त ई आतिशबाज़ी में नीपुरि जयही।अब तोहरे टीम क ऊपर भरोसा ब कि हमरे मिशन क अंजाम तक पहुंचावा।एक चीज और ई जरूर पता कीह कि दिया के साथ आतिशबाजी क कौने क प्लान रहा।"इतना कहने के उपरांत सरदार का स्विच ऑफ हो गया।
            इस प्रकार आज की आतिशबाजी से बाहर के सारे कोरोना मारे गए लेकिन खतरा अभी टला नहीं है अंदर वह अब भी मौजूद हैं। अब उनके ऊपर सबसे ज्यादा खतरा है जिन्होंने आतिशबाजी का प्लान किया था।
          

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

राम आसरे का टेस्ट नेगेटिव

              राम आसरे को उसके लक्षणों के आधार पर क्वारांटाइन में रखा गया था। आज उसके कोरोना टेस्ट के रिजल्ट आने की संभावना थी। कोरोना का तो पता नहीं पर मारे डर के उसका गला सूखा जा रहा था। गला सूखने से उसका डर और बढ़ता जा रहा था क्योंकि इस रोग में गला सूखना एक लक्षण था। राम आसरे स्पष्ट महसूस कर रहा था कि उसके हृदय की धड़कने उसके कान में शिफ्ट हो गई हैं।धक धक धक धक उसके सीने के बजाय कान में हो रहा था।
              राम आसरे का दिल बैठा जा रहा था। तभी डॉक्टर कमरे के अंदर प्रवेश किया और राम आसरे को बधाई देते हुए बताया कि उसका रिजल्ट नेगेटिव आया है। राम आसरे प्रसन्न होने के बजाय डर गया। उसे लगा कि उससे कुछ छुपाया जा रहा है। नेगेटिव तो जीवन में कभी भी अच्छा नहीं रहा है, उसने यही सुन रखा था। पिताजी  भी यही कहकर गरियाया करते थे कि एक नंबर का नेगेटिव आदमी है,बेकार है,जीवन में कुछ नहीं कर पाएगा। इधर उसके डिस्चार्ज किए जाने की तैयारी होने लगी। राम आसरे भयभीत हो गया उसे लगा कि हो ना हो यह लोग उसे जलाने या दफनाने के लिए ले जा रहे हैं।
             राम आसरे हॉस्पिटल में बवाल खड़ा कर दिया। वह जोर जोर से चिल्ला रहा था कि मुझे हॉस्पिटल छोड़कर कहीं नहीं जाना है।सब लोग मुझे मारना चाहते हो।जब मेरा रिजल्ट नेगेटिव आया है तो मुझे बाहर क्यों भेजा जा रहा है। मेरा इलाज करिए मैं कहीं नहीं जाऊंगा। बहुत समझाने के बाद भी राम आसरे अपनी बात पर अड़ा रहा। अंततः पुलिस को बुलाया गया। लाठी के एक ही प्रहार में राम आसरे चुपचाप गाड़ी में जाकर बैठ गए और घर पहुंचा दिए गए।
             व्यावहारिक जगत का सत्य सापेक्षिक है। कभी-कभी नेगेटिव होना पॉजिटिव होने से ज्यादा अच्छा होता है। तालाब के किनारे बैठ कर क्षितिज पर ढलते सूर्य को देखते हुए राम आसरे इसी सत्य को महसूस कर रहा था।
             

वैश्विक वेतन की चौंकाने वाली सच्चाई: GDP बढ़ रहा है, असमानता घट रही है, पर आपकी सैलरी क्यों नहीं बढ़ रही?

क्या आपने कभी सोचा है कि जब देश की अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है, तो आपकी सैलरी  उस गति से क्यों नहीं बढ़ती? यह एक आम भावना है, लेकिन अंतर्...